छत्तीसगढ़ का प्राचीन इतिहास भाग–2

छत्तीसगढ़ प्राचीन इतिहास भाग -1 के अंतर्गत कुछ महत्वपूर्ण बिंदुओं पर हमने चर्चा की तथा छत्तीसगढ़ राज्य में प्रागैतिहासिक काल के स्थलों का तथा वहां प्राप्त साक्ष्यों का वर्णन किया । अतः छत्तीसगढ़ प्राचीन इतिहास भाग 2 के अंतर्गत हम आद्य ऐतिहासिक काल एवं ऐतिहासिक काल का अध्ययन करेंगे जो कि CGPSC एवं CGVYAPM प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण है। कई बार परीक्षा में यहाँ से प्रश्न पूछे भी गये है।

2.आद्य ऐतिहासिक काल (2300-1700ई.पू.)

परिभाषा–वह काल जिसके अंतर्गत पुरातात्विक साक्ष्यों के साथ साथ लेखन कला का भी विकास हुआ था किंतु उसे आज तक पढ़ा न जा सका,,,आद्य ऐतिहासिक काल कहलाता है। इसी काल में कांसे के प्रमाण मिले है इसलिए इसे “कांस्य युग” भी कहा गया है । इस काल मे मुख्यतः सिंधु घाटी सभ्यता हड़प्पा संस्कृति भारत मे विकसित हुई थी ,,। विश्व के संदर्भ में देंखे तो चीनी सभ्यता, सुमेरियन सभ्यता(मेसोपोटामिया सभ्यता) मिश्र की नील नदी घाटी सभ्यता इस काल के अंतर्गत आते हैं।

छत्तीसगढ़ में आद्य ऐतिहासिक काल के प्रमाण अभी तक प्राप्त नहीं हुए हैं।

3.ऐतिहासिक काल–1500-600ई.पू.

ऐतिहासिक काल को मुख्यतः 2 भागों में विभाजित किया है(१) ऋग्वैदिक काल(1500-1000ई.पू.) (२) उत्तर वैदिक काल(1000-600 ई.पू.) इसलिए ऐतिहासिक काल को वैदिक सभ्यता भी कहा है ।

1.ऋग्वैदिक काल-भारत में इंडो-आर्यों का आगमन ऋग्वैदिक काल से माना जाता है । इसी काल में प्रथम वेद ऋग्वेद की रचना हुई थी इसलिए इस काल को ऋग्वैदिक काल कहा गया है। ऋग्वेद भारोपीय भाषाओं का प्राचीनतम ग्रन्थ माना जाता है। ऋग्वैदिक काल में आर्यों का भारत में मुख्य निवास स्थान पंजाब एवं उत्तर प्रदेश चिन्हित किया गया है। इस काल को प्रमुख नदी सिंधु नदी थी तथा एक ओर नदी सरस्वती का भी वर्णन है जिसे नदीतमा या सर्वश्रेष्ठ नदी कहा गया है।ऋग्वैदिक काल मे प्रमुख देवता इंद्र जिन्हें पुरंदर भी कहा जाता था।इंद्र देवता को समर्पित 250 श्लोकों की रचना ऋग्वेद में की गई है।इंद्रा देव को वृष्टि देव की संज्ञा दी गई है। उसके बाद अग्नि देव का स्थान आता है जिनके लिए ऋग्वेद में 200 श्लोकों की रचना की गई है।तीसरे स्थान में वरुण देव का स्थान आता है जिन्हें जल का देवता माना जाता था।

अतः ऋग्वेद में छत्तीसगढ़ का किसी भी प्रकार का वर्णन नहीं मिलता है।

2.उत्तर वैदिक काल — यह काल वैदिक ग्रन्थों पर आधारित है,जिन्हें ऋग्वैद काल के बाद संग्रहित किया गया था।इस काल मे आर्यों का विस्तार पंजाब से लेकर गंगा-यमुना दोआब क्षेत्र के साथ पूरे पश्चिमी उत्तर प्रदेश तक अपना विस्तार कर लिया था। उत्तर वैदिक काल के अंत तक आर्य उत्तर प्रदेश के कोसल से बिहार के विदेह तक फैल गए थे। इसी कोसल प्रदेश के उत्तरी क्षेत्र को उत्तर कोसल तथा दक्षिणी क्षेत्र को दक्षिण कोसल (वर्तमान छत्तीसगढ़) को कहा गया । उत्तर वैदिक काल में नर्मदा नदी का नाम रेवा नदी के नाम से उल्लेक्षित है इसलिए कहा जा सकता है कि उत्तर वैदिक काल मे आर्यों का विस्तार छत्तीसगढ़ में हो चुका था।

3.महाभारत काल—- उत्तर वैदिक काल में ही महाभारत महाकाव्य की रचना हुई थी। इस महाकाव्य के अनुसार 950ई.पू. पांडवों एवं कौरवों के मध्य युध्य हुआ था। भरत और पुरु,दो प्रमुख कबीलों के मिलने से कुरु समुदाय का गठन हुआ। दिल्ली के उत्तरी हिस्से में निवास करने लगे जिसे कुरुक्षेत्र कहा जाने लगा। बाद में ये पांचाल नामक लोगों के साथ रहने लगे थे। पांचालों की राजधानी हस्तिनापुर थी जो कि मेरठ जिले में पड़ता है। महाभारत युद्ध के पश्चात कुरु कबीले ही समाप्त हो गए।

छत्तीसगढ़ का महाभारत काल से सम्बन्ध —

महाभारत काल में छत्तीसगढ़ को महाकवि वेदव्यास के अनुसार प्राक्कोसल राज्य के नाम से जाना जाता था। इसी काल मे बस्तर(दंडकारण्य) को कान्तार नाम से उल्लेक्षित किया गया है। कर्ण द्वारा किये गए दिग्विजय यात्रा में भी कोसल जनपद का उल्लेख है।महाभारत के भीष्म पर्व में महानदी का नाम चित्रोत्पला उल्लेक्षित है। महाभारत कालीन ऋषभतीर्थ की पहचान गुंजी (दमउदरहा)(जांजगीर-चाम्पा) से की गई है।ऋषभतीर्थ का वर्णन महाभारत के वनपर्व में है।(पंडित लोचन प्रसाद के अनुसार)

महाभारत काल में अर्जुन के पुत्र बब्रुवाहन की राजधानी चित्रांगदपुर वर्तमान सिरपुर(महासमुंद) को तथा महाराजा मोरध्वज एवं ताम्रध्वज की राजधानी आरंग को माना जाता है।किन्तु प्राचीन जनश्रुति के अनुसार राजा मोरध्वज का संबंध आरंग ओर रतनपुर दोनों के साथ जोड़ा जाता है तथा मोरध्वज द्वारा राजधानी रतनपुर से आरंग स्थानांतरित किया गया ।

महासमुंद जिले के खल्लारी का संबंध भी महाभारत से जोड़ा जाता है जनश्रुति के अनुसार लाखागृह वर्तमान खल्लारी में था जहां पांडवों को दुर्योधन द्वारा लाख के घर मे आग से जला कर मारने के लिए बनाया गया था।माना जाता है कि खल्लवाटिका से ही खल्लारी नामकरण हुआ है। इसी के निकट ही भीमखोज नामक ग्राम है जिसका संबंध महाभारत काल से किया जाता है,जनश्रुति के अनुसार भीम के पांव के चिन्ह आज भी वहाँ के पत्थरों में अंकित है ।

छत्तीसगढ़ में महाभारत कालीन प्रमुख स्थल निम्नलिखित है—-

  • गुंजी –जांजगीर चांपा
  • आरंग–भांडेर
  • खल्लारी–खल्ल वाटिका
  • सिरपुर—चित्रांगदपुर
  • रतनपुर—मणिपुर

3.छत्तीसगढ़ का रामायण से संबंध——

वैदिक सभ्यता में कोसल राज्य 2 भागों में बंटा हुआ था ,उत्तर कोसल और दक्षिण कोसल में उत्तर कोसल राज्य के अंतर्गत वर्तमान उत्तरप्रदेश ,बिहार राज्य आते थे तथा दक्षिण कोसल के अंतर्गत छत्तीसगढ़ का हिस्सा आता था। इसी समय आर्यों का आगमन दक्षिण कोसल में हुआ।

रामायण काल में छत्तीसगढ़ का नाम दक्षिण कोसल तथा राजधानी कुशस्थली थी।दक्षिण कोसल के राजा भानुमंत की पुत्री कौशल्या का विवाह उत्तर कोसल के राजा दशरथ के साथ हुआ किन्तु राजा भानुमंत का कोई पुत्र न होने के कारण दक्षिण कोसल का राज्य भी राजा दशरथ को प्राप्त हुआ। इसलिए दशरथ पुत्र श्री राम का नौनिहाल छत्तीसगढ़ को माना जाता है। पूरे भारत में माता कौशल्या का एकमात्र मंदिर रायपुर के चंदखुरी में बन रहा है । रामायण काल मे दक्षिण कोसल की भाषा कोसली थी जो छत्तीसगढ़ की सबसे प्राचीन भाषा है।रामायण काल में बस्तर को दंडकारण्य कहा जाता है जहां श्री राम अपने वनवास काल मे कुछ समय यहां व्यतीत किये थे।राम भगवान के 2 पुत्र लव एवं कुश को राज्य विभाजन के समय लव को उत्तर कोसल(राजधानी-श्रावस्ती) का राजा घोषित किया गया तथा कुश को दक्षिण कोसल का राज्य प्राप्त हुआ इस नाम से दक्षिण कोसल की राजधानी कुशस्थली का नामकरण हुआ।

रामायण कालीन प्रमुख स्थल एवं घटनाक्रम निम्न है—

1.सूरजपुर—सितालेखनी पहाड़

2.कोरिया–सीतामढ़ी गुफा(हरचौका) या रसोईघर

3.सरगुजा—-रामगढ़ की पहाड़ी( सीताबेंगरा-लक्ष्मण बेंगरा)

4.खरौद—खरदूषण का वध

5.शिवरीनारायण—शबरी के जूठे बेर श्री राम यही खाये थे।

6.चंदखुरी—कौशल्या माता का मंदिर

7.बलौदाबाजार—वाल्मीकि आश्रम ,लव कुश की जन्मस्थली

8.पंचवटी—(कांकेर)—सीता हरण

9.दंडकारण्य(दंतेवाड़ा)— वनवास काल में यहाँ कुछ समय रुके थे भगवान राम।

छत्तीसगढ़ राज्य सरकार द्वारा रामायण काल के महत्व को देखते हुए रामवनगमन पथ के रूप 51 स्थलों का चयन किया गया है । जिससे पर्यटन को बढ़ावा दिया जा सके जिसकी शुरुआत 22 नवम्बर 2019 को चंदखुरी में माता कौशल्या मंदिर निर्माण से की गई है। वर्तमान में 9 स्थलों को रामवनगमन पथ के रूप में विकसित करने का निर्णय राज्य सरकार द्वारा चिन्हित किया गया है। रामवनगमन पथ के लिए मन्नू लाल यदु की दंडकारण्य रामायण तथा डॉ.हेमू यदु की छत्तीसगढ़ रामायण के राम वन गमन पथ को आधार माना गया है।

4.बौद्ध धर्म का संबंध छत्तीसगढ़ में —

चीनी यात्री व्हेनसांग की यात्रा वृतांत सी-यू-की में दक्षिण कोसल राज्य में बौद्ध धर्म के प्रभाव का वर्णन किया गया है। व्हेनसांग ,नालन्दा विश्वविद्यालय में अध्यापन के लिए आये थे तथा उन्होंने बौद्ध धर्म के सामग्रियों का संकलन एवं बौद्ध धर्म के प्रचार हेतु भारत भ्रमण के लिए जब निकले ,तब छत्तीसगढ़ राज्य तत्कालीन दक्षिण कोसल(श्रीपुर) में कुछ दिनों तक निवासरत थे । अपने यात्रावृत्तांत में ह्वेनसांग में दक्षिण कोसल की राजधानी श्रीपुर को कहा तथा तत्कालीन पांडुवंशी शासक महाशिवगुप्त बालार्जुन का वर्णन किया है।

सिरपुर(जिला-महासमुंद) से प्राप्त बौद्ध धर्म से संबंधित पुरातात्विक साक्ष्य प्रमाण है कि छत्तीसगढ़ में बौद्ध धर्म की समृद्ध परंपरा थी ।

व्हेनसांग की यात्रा वृतांत में छत्तीसगढ़ का नाम कि-या-स-लो नाम से वर्णित है ,सम्भवतः कोसल का अपभ्रंश होगा।

व्हेनसांग ने 639 ई.पू. में सिरपुर की यात्रा की तथा कुछ समय तक यहाँ रुका भी था।

व्हेनसांग ने विश्वविख्यात शून्यवाद के जनक ,महान दार्शनिक, रसायन शास्त्री, मध्यिका सूत्र के जनक नागार्जुन को दक्षिण कोसल का माना है।

आज भी सिरपुर की पहाड़ी में नागार्जुन गुफा स्थित है। जिसे स्थानीय ग्रामीण छेरी गोदरी गुफा कहते है।

बौद्ध धर्म के प्रमुख ग्रंथ अवदान शतक में भी छत्तीसगढ़ का नाम दक्षिण कोसल नाम से उल्लेखित है।गौतम बुद्ध भी कुछ समय के लिए श्रीपुर (सिरपुर)में रुके थे।

मौर्य सम्राट अशोक के शासन काल मे छत्तीसगढ़ में बौद्ध धर्म का व्यापक प्रचार प्रसार हुआ जिसके प्रमाण सरगुजा के रामगढ़ पहाड़ी के सीताबेंगरा एवँ जोगीमारा गुफा में मौर्य कलीन उत्कीर्ण लेख प्रमाण स्वरूप आज भी स्थित है।

व्हेनसांग के अनुसार सिरपुर में 100 संघाराम (बौद्ध स्तूप) एवं 1000 महायानी बौद्ध भिक्षुओं को निवास करते देखा है। सम्भवतः ये स्तूप सम्राट अशोक द्वारा बनाये गए होंगे।

अतः कहा जा सकता है कि सम्राट अशोक के समय से ही दक्षिण कोसल में बौद्ध धर्म का व्यापक प्रचार प्रसार हो चुका था।

छठवीं शताब्दी में बौद्ध भिक्षु आनंद प्रभु ने स्वास्तिक विहार का निर्माण सिरपुर में किया था जो कि आज भी आनंद प्रभु कुटी विहार के नाम से अवस्थित है।

5.छत्तीसगढ़ का जैन धर्म से संबंध —-

बौद्ध धर्म के समान जैन धर्म का भी छत्तीसगढ़ में व्यापक प्रचार प्रसार मिलता है। आज भी छत्तीसगढ़ में विद्यमान कई जैन मंदिर एवं पुरातत्विक उत्खनन से प्राप्त सामग्री जैन धर्म की गौरवशाली संस्कृति को दर्शाती है।

★जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव के प्रमाण गुंजी (दमाऊदरहा)(जांजगीर-चांपा) से प्राप्त होते है।

★ऋषभदेव की मूर्ति जिला बिलासपुर के मल्हार के समीप बूढ़ीखार से भी प्राप्त हुई है।

★ राजिम में पुरातत्व उत्खनन के समय 1600 वर्ष पुरानी ऋषभदेव की मूर्ति प्राप्त हुई है।

★ नगपुरा(जिला-दुर्ग) में 23वें तीर्थ कर पार्श्वनाथ की मंदिर आज भी विद्यमान है।

★ बस्तर के भाटागुड़ा में जैन धर्म के 16 वें तीर्थंकर शांति नाथ की 3फिट पाषाण मूर्ति प्राप्त हुई है।

★ जिला-गौरेला-पेंड्रा-मरवाही का प्राचीन नगर धनपुर में जैन धर्म से संबंधित प्राचीन मूर्तियां आज भी विद्यमान है।

★ मंदिरों की नगरी आरंग में स्थित भांडलदेव मंदिर आज भी अवस्थित है ,जो कि जैन धर्म से संबंधित है।

जैन धर्म की दोनों शाखाओं दिगम्बर एवं श्वेतांबर शाखायों का प्रभाव रहा है।

भांडल देव मंदिर आरंग

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By–PRAVIN PRADHAN

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