CHHATTISGARH ANCIENT HISTORY PART 4 छत्तीसगढ़ प्राचीन इतिहास भाग–4

छत्तीसगढ़ प्राचीन इतिहास भाग–4  

छत्तीसगढ़ प्रचीन इतिहास भाग- 3 में हमने भारतीय इतिहास के ऐसे प्रमुख राजवंशो का अध्ययन किया जिनका प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष शासन छत्तीसगढ़ में रहा । जिसके अंतर्गत हमने सातवाहन वंश,वाकाटक वंश,गुप्त वंश के दक्षिण कोसल में प्रभाव का पुरातात्विक साक्ष्यों के साथ  विस्तार से अध्ययन किया है।किन्तु छत्तीसगढ़ प्राचीन इतिहास भाग -4 के अंतर्गत हम  छत्तीसगढ़ के प्राचीन स्थानीय राजवंशों का अध्ययन करेंगे जो, कि दक्षिण कोसल में स्वतंत्र रूप से या किसी बड़े सम्राट के अधीनस्थ मांडलिक के रूप में राज्य करते थे। 

हमने आज के लिए जो विषय सूची बनाया वो इस प्रकार है।                                                   

         छत्तीसगढ़ के प्राचीन (स्थानीय)राजवंश

छत्तीसगढ़ स्थानीय राजवंश के अंतर्गत हम दक्षिण कोसल एवं बस्तर के राजवंशों का अलग अलग अध्ययन करेंगे ,क्योंकि तत्कालीन समय में दोनों का राज्यविस्तार भिन्न-भिन्न था ,जिससे कि अध्यापन के समय किसी प्रकार का संदेह उत्पन्न न हो।

      दक्षिण कोसल के स्थानीय राजवंश

  1. राजर्षि तुल्य कुल वंश
  2. शरभपुरीय वंश
  3. पाण्डुवंश/सोमवंश
  1. बाण वंश
  2. फणी नाग वंश 

      बस्तर के स्थानीय राजवंश

  1. नल वंश
  2. छिंदक नाग वंश
  3. काकतीय वंश


1.राजर्षि तुल्य कुल वंश–

राजर्षि तुल्य कुल वंश छत्तीसगढ़ में ज्ञात सभी वंशो में सबसे प्राचीन राजवंश माना जाता है।इस कुल का शासन काल पाँचवी शताब्दी के आसपास रहा होगा (कुछ इतिहासकार इनका शासन काल चौथी से छठवीं शताब्दी तक मानते है।)

इस वंश का ताम्रपत्र आरंग(रायपुर)  से प्राप्त हुआ है जिससे इस वंश बारे में पता चलता है। राजर्षि तुल्य कुल वंश की राजधानी आरंग रही होगी। आरंग ताम्रपत्र राजर्षि तुल्य कुल वंश के शासक भीमसेन द्वितीय ने सुवर्ण(सोन) नदी तट पर प्रदत्त किया था। उक्त ताम्रपत्र में हरिस्वामी एवं बपस्वामी को दोण्ड में स्थित भट्टपलिका ग्राम दान में देने का उल्लेख है।

आरंग ताम्रपत्र से भीमसेन द्वितीय और उसके पूर्व के 5 अन्य शासकों का नाम उल्लेख है—-शुर,दयित् वर्मा प्रथम,विभीषण, भीमसेन प्रथम,दयित वर्मा द्वितीय, भीमसेन द्वितीय ।

कलिंग के राजा खारवेल की प्रशस्ति पत्र में “राजर्षि वंश तुल्य कुल विनसृत” उल्लखित है। यह वाक्य इस वंश से संबंधित है या किसी अन्य वंश से अभी तक स्पष्ट नहीं हुआ है।  

शार्ट नोट्स के रूप में—

वंश–राजर्षि तुल्य कुल वंश

राजधानी—- आरंग 

प्रतापी शासक— भीमसेन द्वितीय

ताम्रपत्र—आरंग

विशेष तथ्य—राजर्षि तुल्य कुल वंश को सबसे प्राचीन राजवंश माना जाता है।

2.शरभपुरीय वंश–    छत्तीसगढ़ राज्य के कुछ हिस्से पर शरभपुरीय वंश का शासन था,शरभपुरीय वंश का शासन काल पांचवी और छठवीं सदी के आसपास था। शरभपुरीय राजवंश की राजधानी शरभपुर था किंतु शरभपुर वर्तमान में किस नगर को कहा गया है आज भी इतिहासकारों के लिए रहस्य बना हुआ है। अलग अलग इतिहासकारों के मतानुसार वर्तमान सारंगढ़ एवं संबलपुर(ओडिशा)  को शरभपुर नगर के लिए चिन्हित किया गया है। शरभवंश का संस्थापक शरभराज को माना जाता है तथा इनका ताम्रपत्र सारंगढ़ में प्राप्त होने के कारण सारंगढ़ को राजधानी माना जाता है।गुप्त संवत 191 अर्थात 510 ई.के एरण अभिलेख में शरभराज को गोपराज का नाना कहा गया है,जो कि गुप्त शासक भानुमंत का सामन्त था।

 एक अन्य ताम्रपत्र के अनुसार शरभवंश को अमरार्यकुल भी कहा गया है तथा व्याघ्रराज के मल्लार ताम्रपत्र में इन्हें अमरजकुल भी कहा गया है। शरभवंश कि राजाओं ने अपने परवर्ती राजाओं को श्रीपुरीय भी कहा है।शरभपुरीय राजाओं का राजचिन्ह गजलक्ष्मी था जो उनके समस्त दानपत्रों की महर पर पाया गया है।  

शरभपुरीय वंशी राजाओं का विवरण—

  1. शरभराज–

शरभवंश का संस्थापक राजा शरभराज था। एरण अभलेख(510ई) के अनुसार शरभराज को गोपराज का नाना कहा गया है।

     2.नरेंद्र 

 शरभराज का पुत्र नरेन्द्र था। शरभराज कि मृत्यु के बाद नरेंद्र शासक बना,इसके शासनकाल के 2 ताम्रपत्र मिले है एक सारंगढ़(रायगढ़) के ग्राम पिपरदुला में तथा दूसरा ताम्रपत्र कुरूद(धमतरी) में मिला है। 

पिपरदुला ताम्रपत्र शरभपुर स्थान से जारी की गई थी,यह ताम्रपत्र राजा नरेन्द्र के सिंहासन रूढ़ होने के तृतीय वर्ष में दिया गया था।इससे राहुदेव नामक भोगपति द्वारा एक ग्राम को दान में देने की पुष्टि महाराज नरेंद्र द्वारा की गई है।

दूसरे ताम्रपत्र को महाराजा नरेंद्र ने अपने शासन के 24 वें वर्ष में जारी किया था इसमें भी एक ब्राह्मण को ग्राम दान देने का विवरण मिलता है।

3.प्रसन्नमात्र— 

राजा नरेंद्र के बाद उसका पुत्र प्रसन्नमात्र शासक बना। इस वंश का प्रतापी शासक प्रसन्नमात्र को माना जाता है क्योंकि इसके बाद के राजाओं की वंशावली प्रसन्नमात्र से ही होती है अर्थात इसके उपरांत जितने भी अभिलेख इस वंश के प्राप्त हुए है उसमें वंशावलियों में वंश का प्रारम्भ प्रसन्नमात्र से किया गया है।प्रसन्नमात्र ने निडिला(लीलागर) नदी के किनारे प्रसन्नपुर नगर बसाया जिसे वर्तमान में मल्हार नगर के रूप में चिन्हित किया गया है। प्रसन्नमात्र ने अपने शासनकाल में स्वर्ण मुद्राएँ जारी की थी। प्रसन्नमात्र कि सिक्के सिरपुर ,कटक(ओडिशा) और चांदा( महाराष्ट्र ) से प्राप्त हुए है यह उसके राज विस्तार को दर्शाता  है। 

प्रसन्नमात्र के स्वर्ण सिक्के में गरूड़ शंख  चक्र अंकित थे।

प्रसन्नमात्र के उत्तराधिकारी के संबंध में इतिहासकारों में आज भी मतभेद है।प्रसन्नमात्र के दो पुत्र माने जाते है जयराज(जयराम) और मनमात्र दुर्गराज,किन्तु कहीं कहीं पर जयराज ओर मनमात्र को एक ही व्यक्ति माना गया है।

3.जयराज—

इतिहासकारों के अनुसार जयराज को ही प्रसन्नमात्र का उत्तराधिकारी माना गया है।मल्हार से प्राप्त ताम्रपत्र के अनुसार इसे दुर्ग शहर की स्थापना का श्रेय दिया जाता है इसलिए इसको अन्य नाम मनमात्र दुर्गराज से भी संबोधित  किया गया है। जयराज ने अपने सिक्कों में गजलक्ष्मी का अंकन कराया था।जयराज के द्वारा शरभपुर से तीन ताम्रपत्र जारी किए है दो मल्हार(बिलासपुर) से ओर एक आरंग(रायपुर) से ।जयराज के 3 पुत्र थे—सुदेवराज,प्रवरराज और व्याघ्रराज ।

4.सुदेवराज—-

जयराज के बाद उसका पुत्र सुदेवराज शरभपुर का उत्तराधिकारी बना और शासन करने लगा । इस वंश के सभी शासकों को सर्वाधिक ताम्रपत्र सुदेवराज के प्राप्त होते है। इसके द्वारा 6 ताम्रपत्र शरभपुर और सिरपुर से जारी किए गए थे। सुदेवराज के शासन काल में पांडुवंशी शासक इन्द्रबल राज उसका सामन्त था।कौवाताल अभिलेख (महासमुंद) में इन्द्रबल को सुदेवराज का सामन्त कहा गया है।

5.प्रवरराज प्रथम–

सुदेवराज राज जब शरभपुर का शासक बना तब उसका छोटा भाई प्रवरराज प्रथम सिरपुर  में सामन्त के रूप में शासन करने लगा तथा राज्य भी अर्जन करने लगा। प्रवरराज प्रथम ने पहली बार सिरपुर को अपनी राजधानी बनाया,किन्तु अल्प काल में मृत्यु हो जाने के कारण बाद में सुदेवराज सिरपुर का शासक बना। प्रवरराज प्रथम ने अपने शासनकाल में 2 ताम्रपत्र मल्हार तथा सारंगढ़ से जारी किए थे।प्रसन्नमात्र का तीसरा पुत्र व्याघ्रराज प्रवरराज के सामन्त के रूप में कार्य करता था इसका ताम्रपत्र मल्हार से प्राप्त हुआ है।

6.प्रवरराज द्वितीय—-

प्रवरराज द्वितीय को शरभवंश का अंतिम शासक माना जाता है। सुदेवराज के सामन्त इन्द्रबल ने इसकी हत्या कर सिरपुर में पाण्डुवंश की स्थापना की ।

शरभवंश के बारे में महत्वपूर्ण तथ्य—

शासन काल–5 वीं से 6 वी सदी तक

राजधानी–शरभपुर 

संस्थापक—शरभराज

प्रमुख धर्म–वैष्णव

स्थापित प्रमुख नगर—प्रसन्नपुर( मल्हार)

अंतिम शासक—प्रवरराज द्वितीय 

अन्य नाम—अमरजकुल,अमरार्य कुल

विशेष— इनके अभिलेख में किसी सन या संवत का उल्लेख नहीं है।

अपने ताम्रपत्रों में स्वयं को परमभागवत कहते थे।

3.पाण्डुवंश(सोमवंश) 

शरभपुरीय वंश के शासन के पश्चात दक्षिण कोसल पर शासन करने वाला महत्वपूर्ण राजवंश पाण्डुवंश को माना जाता है। पाण्डुवंश को ही सोमवंश कहा जाता है। अमरकंटक(मध्यप्रदेश) क्षेत्र सोम क्षेत्र कहलाते थे,किन्तु पाण्डुवंश स्वंय को पांडवों से संबंध बतलाते थे और स्वयं को पाण्डुवंशी कहते थे।इस वंश के शासक तीवर देव के राजिम प्लेट 1785 ई. प्राप्त हुआ जिसमें इस वंश के इतिहास के बारे में पता चलता है।छत्तीसगढ़ में शासन करने के पूर्व पाण्डुवंश का शासन मेकल अंचल में था ।पाण्डुवंशियो ने पहली बार इस प्रदेश को कोसल प्रदेश कहा और स्वयं को कोसलाधिपति से सम्मानित किया।इनके ताम्रपत्र सिरपुर से जारी किए गए है इसलिए सिरपुर को इनकी राजधानी मान्य की गई है। पाण्डुवंशी अपनी अभिलेखों में दो भिन्न लिपियों का प्रयोग करते थे ,ताम्रपत्रों में पेटिका शीर्ष लिपि तथा शिलालेखों में कीलाक्षर लिपि का प्रयोग करते थे।

पाण्डुवंश/सोमवंश के छत्तीसगढ़ में चार प्रमुख शाखा थे जो कि निम्न है—

.सिरपुर का पाण्डुवंश

२.मैकल का सोमवंश

३.कांकेर के सोमवंश

४.ओडिशा का सोमवंश 

१.सिरपुर का पाण्डुवंश(सोमवंश-)

सिरपुर के पाण्डुवंश सोनपुर -बलांगीर(ओडिशा) के सोमवंश से भिन्नता प्रकट करने के लिए ये स्वयं को पाण्डुवंशी कहने लगे ओर इसी नाम से दक्षिण कोसल में शासन करने लगे । सिरपुर( महासमुंद ) को अपनी राजधानी बनायी ओर यही से शासन करने लगे।इस वंश का आदिपुरुष कालिंजर शिलालेख के अनुसार उदयन को कहा जाता है ।उदयन का पुत्र इन्द्रबल जो कि दक्षिण कोसल में पाण्डुवंश का संस्थापक बना।

 6वी से 7वी सदी तक पाण्डुवंशी शासकों ने दक्षिण कोसल पर शासन किया।

           प्रमुख शासक

1.उदयन– पाण्डुवंश का आदिपुरुष।

उदयन का ताम्रपत्र या शिलालेख छत्तीसगढ़ में नही मिला है ।

इन्द्रबल के अभिलेख से ज्ञात होता है ,कि उदयन उसका पिता था।

कालिंजर अभिलेख के अनुसार उसका कार्यक्षेत्र सेंट्रल प्रोविंस के जुड़े भाग तक था।

2.इन्द्रबल राज—

इन्द्रबल उदयन का पुत्र तथा शरभपुरीय शासक सुदेवराज का सामन्त था। इसने प्रवरराज द्वितीय की हत्या कर सिरपुर में पाण्डुवंश की स्थापना की।

इसलिए इसे पाण्डुवंश का छत्तीसगढ़ में वास्तविक संस्थापक माना जाता है। इन्द्रबल का अन्य नाम भरतबल भी है।अमरार्य कुल की राजकुमारी लोकप्रकाशा के साथ इसका विवाह हुआ था।इन्द्रबल ने इंद्रपुर नामक शहर को बसाया जो कि वर्तमान खरौद(जांजगीर-चांपा) है।

इन्द्रबल के चार पुत्र थे -1.नंनराज प्रथम 2.सुरबल 3.ईशान देव 4.भवदेव 

3.नंनराज प्रथम

 नंनराज प्रथम इन्द्रबल का उत्तराधिकारी बना। इसने स्वयं को सिरपुर का शासक घोषित किया और अपने भाईयों को मंडलाधिपति के रूप में स्थापित भी किया ।इसने राजाधिराज या अधिराज की उपाधि धारण की थी।

4.ईशान देव—

इन्द्रबल का पुत्र तथा खरौद का मंडलाधिपति था। इसने खरौद में लक्ष्मणेश्वर मंदिर का निर्माण किया। इस मंदिर में 1 लाख चावल चढ़ाने की परंपरा है। यह एक शिव मंदिर है।

5.महाशिव तीवर देव—

नंनराज का पुत्र एवं तीवर देव सिरपुर का उत्तराधिकारी बना । महाशिव तीवर देव को पांडु वंश का उत्कर्ष काल कहा गया है। इसके 3 ताम्रपत्र से इसके शासन की पुष्टि होती है।महाशिव तीवर देव नाम का वर्णन ताम्रपत्रों में है अर्थात महाशिव शाही उपाधि थी ।

महाशिव तीवर देव सकल कोसलाधिपति  उपाधि धारण करने वाला प्रथम पाण्डुवंशी शासक था। इसका शासन क्षेत्र दक्षिण कोसल से मैकल श्रेणी ओर ओडिशा के कुछ हिस्सों तक था।महाशिव तीवर देव विष्णु धर्म का अनुयायी था इसलिए परमवैष्णव कि उपाधि भी धारण की थी ।इसने अपनी मुद्रा मे गरूड़ उत्कीर्ण कराया था।बोड़ा ताम्रपत्र(रायगढ़) का सम्बंध महाशिव तीवर देव से है।तीवर देव के पुत्र और दामाद दोनो का नाम नंनराज था इसलिए अपने दामाद को पंचमहाशब्द की उपाधि दी थी । महाशिव तीवर देव विष्णु कुण्डी माधव वर्मन प्रथम से युद्ध करते हुए मारा गया। 

6.नंनराज द्वितीय–

अड़भार ताम्रपत्र के अनुसार तीवरदेव का पुत्र नंनराज द्वितीय था।नंनराज द्वितीय विष्णु का उपासक था।वर्तमान महाराष्ट्र के वर्धा नदी तक नंनराज द्वितीय ने साम्राज्य विस्तार किया था।

नंनराज द्वितीय ने कोसलमंडलाधिपति की उपाधि धारण किया था।इसके सम्राज्य विस्तार में देवरक्षित नाम का प्रमुख योगदान था ।

7.चंद्रगुप्त —

नंनराज द्वितीय निःसन्तान होने के कारण महाशिव  तीवरदेव का छोटा भाई चंद्रगुप्त दक्षिण कोसल का शासक बना। सिरपुर अभिलेख से चंद्रगुप्त की जानकारी मिलती है। चंद्रगुप्त ने माधव वर्मन द्वारा जीते राज्यों को अपने पराक्रम से पुनः प्राप्त किया। मात्र 5 वर्ष शासन करने के पश्चात अपने पुत्र हर्षगुप्त को उत्तराधिकारी नियुक्त किया।

8.हर्षगुप्त—

चंद्रगुप्त का पुत्र हर्षगुप्त दक्षिण कोसल का राजा बना। इसका विवाह मगध के मौखरी नरेश सूर्यवर्मन की पुत्री वासटा देवी से हुआ। हर्षगुप्त की स्मृति में रानी वासटा देवी ने सिरपुर में लक्ष्मण मंदिर का निर्माण किया जो कि एक विष्णु मंदिर है। इस मंदिर का निर्माण लगभग 600 ई. में हुआ है। लक्ष्मण मंदिर लाल ईंट से निर्मित हुआ है जो कि उत्तर गुप्तकाल के वास्तुकला का श्रेष्ठ उदाहरण है। नेपाल नरेश जयदेव के शिलालेख मे इसके नाम का वर्णन मिलता है। लक्ष्मण मंदिर सिरपुर के शिलालेख के अनुसार हर्षगुप्त की उपाधि प्राक परमेश्वर एवं त्रिकलिंगाधिपति थी। हर्षगुप्त वैष्णव धर्म का उपासक था।

हर्षगुप्त की मृत्यु के पश्चात उसका पुत्र महाशिवगुप्त बालार्जुन दक्षिण कोसल का शासक बना।

9.महाशिव गुप्त बालार्जुन—

महाशिवगुप्त बालार्जुन राजा हर्षगुप्त एवं रानी वासटा देवी का पुत्र था । सिरपुर अभिलेख के अनुसार इसने राजधानी सिरपुर से 595 ई.-655 ई. तक लगभग 60 वर्ष तक लंबा शासन था। इसके शासनकाल को देख के ही पता चलता है कि यह एक प्रतापी ओर जनप्रिय शासक था । बचपन से ही धनुर्विद्या में निपुण होने के कारण इसका नाम बालार्जुन हुआ। दक्षिण कोसल के साथ- साथ विंध्यप्रदेश दुर्ग,रायपुर,बिलासपुर ओर ओडिशा के संबलपुर तक इसका शासन था।

चीनी यात्री व्हेनसांग इसी के शासनकाल में 639ई.में छत्तीसगढ़ प्रवास में आया था। व्हेनसांग की रचना सी-यू-की में इस क्षेत्र का नाम की-या-स-लो वर्णित है।महाशिवगुप्त बलार्जुन शैव धर्म का उपासक था। किंतु सभी धर्मों को इसने संरक्षण दिया था,इसके शासनकाल में सिरपुर बौद्ध धर्म का प्रमुख केंद्र था।महाशिवगुप्त बालार्जुन की मुद्रा पर गजलक्ष्मी के स्थान पर कुकुदमाल ,वृषभ तथा त्रिशूल का अंकन था। इसके शासन काल से यह वंश पाण्डुवंश से सोमवंश के रूप में प्रसिद्ध हुआ।महाशिवगुप्त बालार्जुन के दरबार मे महान कवि ईशान थे।

ऐहोल अभिलेख (634ई.) के अनुसार बालार्जुन पुलकेशिन द्वितीय की अधीनता स्वीकार किया था। महाशिवगुप्त बालार्जुन के शासनकाल में उत्तर भारत मे हर्षवर्धन ओर दक्षिण भारत मे पुलकेशिन द्वितीय(चालुक्य) एवं नरसिंह वर्मन प्रथम( पल्लव) वंश का साम्रज्य था।सिरपुर में 27 ताम्रपत्र महाशिवगुप्त बालार्जुन का के मिले है, किंतु सिक्का एक भी नही मिला है।महाशिवगुप्त बालार्जुन के भाई रण केसरी ओर एक पुत्र शिवनंदी का पता चलता है। महाशिवगुप्त बालार्जुन के शासन काल को दक्षिण कोसल का स्वर्ण युग कहा जाता है।

महाशिवगुप्त बालार्जुन के पश्चात दक्षिण कोसल पर नल वंशी शासको ने शासन किया।सिरपुर में प्राप्त बौद्ध प्रतिमा

सिरपुर लक्ष्मण मंदिरश्री गंधेश्वर नाथ महादेव मंदिर सिरपुर

२.मैकल का पाण्डुवंश

आधुनिक अमरकंटक(मध्यप्रदेश) का क्षेत्र मैकल क्षेत्र कहलाता था। यहाँ से इस वंश के बारे में पता चलता है। भरत बल के बहमनी ताम्रपत्र से इस वंश के बारे में जानकारी मिलती है।

बहमनी ताम्रपत्र में जयबल,वत्सबल,नागबल,भरतबल, सुरबल का उल्लेख है।

बहमनी ताम्रपत्र में नागबल के लिए  महाराज उपाधि का प्रयोग हुआ है।मल्हार से प्राप्त एक ताम्रपत्र में भरतबल के पुत्र शुरबल का उल्लेख मिलता है।

कलचुरियों से सर्वप्रथम संघर्ष करने वाला वंश यही था।

3.कांकेर का सोमवंश—

कांकेर के सोमवंश का शासन काल लगभग 1191 ई.से 1320 ई तक था। कांकेर के सोमवंश के संस्थापक सिंहराज को माना जाता है। इस वंश के अन्य राजाओं में व्याघ्रराज ,वोपदेव ,कर्णराज का उल्लेख सिहावा ताम्रपत्र में मिलता है तथा कृष्णराज एवम सोमदेव का भी संबंध कांकेर के सोमवंश से किया जाता है।

कांकेर से एक शासक भानुदेव का लेख मिलता है।

4.ओडिशा के सोमवंश—

ओडिशा सोमवंश के राजाओं को इतिहासकारों ने कलिंग का सोमवंश भी कहा है क्योंकि सोमवंशी राजा स्वयं को त्रिकलिंगाधिपति या कोसलेंद्र उपाधि से संबोधित करते थे। इस वंश का संस्थापक शिवगुप्त को माना जाता है तथा इनका प्रमुख शासन क्षेत्र कोसल,उत्कल ओर कलिंग क्षेत्र था एवं इनका शासन काल 9वीं से 11 वीं सदी तक था। इस वंश में राजाओ के 2 ही नाम चलते थे महाशिवगुप्त ओर महाभवगुप्त 

इनकी राजधानी सिरपुर थी।

 इस वंश के प्रमुख शासक—

शिवगुप्त—- इस वंश का संस्थापक। इतिहासकार विष्णु मिराशी के अनुसार इसके शासन में कल्चुरी राजा मुग्ध तुंग ने कोसल पर आक्रमण किया था और पाली क्षेत्र में विजय प्राप्त किया था ।

जन्मजेय (महाभवगुप्त प्रथम )—शिवगुप्त के बाद उसका पुत्र जन्मजेय महाभवगुप्त प्रथम राजा बना इसका अन्य नाम धर्मकंदर्प एवं स्वभाव तुंग  था । महाभवगुप्त प्रथम के 13 ताम्रपत्र प्राप्त हुए है।इन ताम्रपत्रों में इसे परमभट्टारक, महाराजधिराज, परमेश्वर, सोमकुलतिलक की उपाधियों से उल्लेखित किया गया है। 

इसने कोसल,उत्कल एवं कलिंग पर शासन करता था इसलिए कोसलेंद्र एवं त्रिकलिंगाधिपति की उपाधि धारण किया हुआ था। 

ययाति-(महाभवगुप्त प्रथम)— 

इसका शासन काल 970 ई से 1000 ई. माना गया है।ययाति के प्रारंभिक ताम्रपत्र विनितपुर (ओडिशा) से जारी किए गये थे तथा उसके शासन के 24 वें एवं 28 वें वर्ष में दानपत्र ययातिनगर से दिए गए है।  अतः महाभवगुप्त को ययातिनगर बसाने का श्रेय जाता है।

भीमरथ-(महाभवगुप्त द्वितीय)–   भीमरथ महाभवगुप्त द्वितीय के नाम से सिंहासनरूढ़ हुआ। इसका शासनकाल-1000 ई से 1015 ई तक माना गया है।इसकी राजधानी ययातिनगर थी।

धर्मरथ– (महाशिवगुप्त द्वितीय)

भीमरथ का उत्तराधिकारी धर्मरथ हुआ।इसका शासन काल 1015 ई.से 1020 तक माना जाता है।अल्पकाल में निःसन्तान मृत्यु होने पर इसका भाई  नहुष राजा बना।

नहुष(महाभवगुप्त तृतीय)–  

इसका शासन कठिनाई पूर्ण था। शत्रुओं के आक्रमण के कारण उसके राज्य के कुछ भागों पर  शत्रुओं ने अधिकार कर लिया। 

 इन्द्रश्च– कल्चुरी, भोज,परमार, चोल वंश के राजाओं द्वारा कलिंग,उत्कल तथा ओड्र के विजय अभिलेख में इसका नाम उल्लेखित है।

ययाति चंडीहर—(महाशिवगुप्त तृतीय)—ययाति चंडीहर प्रतापी राजा था । इसने अपने खोये साम्रज्य को शत्रुओं से मुक्त किया।

उद्योगकेसरी(महाभवगुप्त चतुर्थ)—उद्योग केसरी 1055 ई में राजा बना। इसने डाहल, ओड्र तथा गोंड़ नरेशों से विजय प्राप्त की थी

इस वंश का अंतिम प्रतापी शासक था जिसने उत्कल एवं कोसल दोनों राज्यों में शासन किया।

कर्ण केसरी—

इस वंश का अंतिम शासक इसके शासन काल मे अनंतवर्मा चोड्गंग ने उत्कल पर विजय प्राप्त किया था कोसल पर कलचुरियों ने आक्रमण कर विजय प्राप्त किया। 

प्रिय पाठकगण इतिहास भाग 4 के अंतर्गत हमने पाण्डुवंश का पूर्णतः अध्ययन किया यह बहुत ही महत्वपूर्ण टॉपिक था CGPSC एवं CGVYAPM की परीक्षाओं के लिए आशा करता हूँ कि आज का पोस्ट आप सभी को अच्छा लगा होगा। अगले पोस्ट में हम बाण वंश, फणी नाग वंश ,छिन्दक नाग वंश का अध्ययन करेंगे। PDF download  लिंक में जाकर डाऊनलोड कर सकते है ।

P R CLASSES BALODA 

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