छत्तीसगढ़ का प्राचीन इतिहास भाग-5
छत्तीसगढ़ इतिहास भाग- 4 के अंतर्गत हमने दक्षिण कोसल में शासन करने वाले स्थानीय प्राचीन राजवंशो का विस्तार से अध्ययन किया जिसके अंतर्गत हमने राजर्षि तुल्य कुल वंश,शरभपुरीय वंश एवम पाण्डुवंश का विस्तृत अध्ययन किया ।उपरोक्त तीनों वंश छत्तीसगढ़ के प्राचीन इतिहास के संदर्भ में बहुत ही महत्वपूर्ण है। आज के पोस्ट में हम छत्तीसगढ़ के निम्नलिखित वंशों का अध्ययन करेंगे—-
दक्षिण कोसल के राजवंश
1.बाण वंश
2.फणि नागवंश
बस्तर के प्रमुख राजवंश
1.नल वंश
2.छिन्दक नाग वंश
3.काकतीय वंश
छत्तीसगढ़ प्राचीन इतिहास भाग-5 के अंतर्गत सर्वप्रथम बाण वंश के इतिहास का अध्ययन करेंगे—
1.बाण वंश
बाण वंश का प्रथम उल्लेख पाली(कोरबा) से प्राप्त अभिलेख से ज्ञात होता है। इनका शासन क्षेत्र मुख्यतः पाली ओर बिलासपुर के आसपास का क्षेत्र रहा है। दक्षिण कोसल के अंश क्षेत्र में ही इनका शासन था ।
पाली (कोरबा) अभिलेख से ज्ञात होता है ,कि इस वंश का संस्थापक महामंडलेश्वर मल्लदेव को माना जाता है। बाण वंश के शासकों ने पाली को अपना राजधानी बनाया था इसके आसपास के क्षेत्र में ही शासन करते थे। अभिलेखीय स्रोतों के अनुसार इन्होंने लगभग 9 वीं सदी में इस क्षेत्र में शासन करते थे। बाण वंश के सभी शासकों में सबसे प्रतापी शासक विक्रमादित्य था। राजा विक्रमादित्य ने पाली में शिवमंदिर का निर्माण किया जिसे बाद में कल्चुरी शासक जाजल्लदेव प्रथम ने जीर्णोद्धार करवाया था। पाली का शिवमन्दिर आज भी सुरक्षित है।
पाली में प्रस्तर मंदिर के निर्माण का श्रेय भी भी राजा विक्रमादित्य को ही जाता है।
त्रिपुरी के कल्चुरी शासक शंकरगण द्वितीय ने विक्रमादित्य को पराजित इस वंश के शासन को समाप्त कर दिया । बाद के वर्षों में इन्ही कल्चुरी शासकों ने दक्षिण कोसल में सबसे लंबा शासन किया।
शार्ट नोट्स–
वंश का नाम– बाण वंश
शासन काल–9 वीं सदी
संस्थापक—महामंडलेश्वर मल्लदेव
प्रमुख़ शासक—राजा विक्रमादित्य
स्थापत्य कला— पाली का शिवमंदिर
पाली में प्रस्तर मंदिर (निर्माता–राजा विक्रमादित्य)
जीर्णोद्धार कर्ता–जाजल्लदेव प्रथम)
छत्तीसगढ़ के 2 प्रमुख स्थानीय राजवंश जिन्हें नाग वंश कहा जाता है।1.फणि नाग वंश 2.छिन्दक नाग वंश। दोनों ही नाग वंशों का शासन क्षेत्र भिन्न-भिन्न था तथा इनके उत्पत्ति के कारण भी अलग-अलग है। फणि नाग वंश छत्तीसगढ़ के कवर्धा क्षेत्र में तथा छिन्दक नाग वंश बस्तर क्षेत्र में शासन करते थे। इन दोनों ही वंशों का विस्तृत अध्ययन हम छत्तीसगढ़ के मध्यकालीन इतिहास में विस्तार से चर्चा करेंगे।
बस्तर का प्रमुख प्राचीन राजवंश
1.नल वंश(4थी शताब्दी)
नलवंश बस्तर क्षेत्र का प्रमुख राजवंशों में से एक है । इस वंश के राजाओं ने अपने पराक्रम से दक्षिण कोसल के भी कुछ हिस्सों में शासन करते थे। नल वंश का इतिहास बहुत ही रोचक है।
नल वंश का उल्लेख वायु पुराण एवं ब्रम्ह पुराण में मिलता है जिन्हें दक्षिण कोसल का शासक कहा गया है।प्रसिद्ध इतिहासकार डॉ.पी.एल. मिश्रा के अनुसार इनका शासन 4 शताब्दी में बस्तर क्षेत्र में था।
सबसे पहले समुद्रगुप्त के प्रयाग प्रशस्ति(इलाहाबाद) से ज्ञात होता है कि नल वंश का शासन बस्तर क्षेत्र में था।
वायुपुराण के अनुसार नलों को नैषध और दक्षिण कोसल का शासक कहा गया है। किंतु दंडकारण्य के नल पौराणिक नहीं अपितु पुरायुगीन है। नल शासकों की राजधानी पुस्करी(भोपालपट्टनम) कोरापुट(ओडिशा) थी।नल वंश का प्रथम शासक शिशुक(वृषध्वज) जिसे नल वंश का आदि पुरुष भी कहा जाता है ,को माना गया है।
किन्तु नल वंश का वास्तविक शासक वराहराज था।
प्रमुख नल वंशी शासकों के शासनकाल निम्नलिखित है।
1.शिशुक(वृषध्वज)-(290 ई.से 330ई)- नल वंश का आदिपुरुष माना जाता है।
2.व्याघ्रराज-(330ई से 370ई.) समुद्रगुप्त के प्रयाग प्रशस्ति में व्याघ्रराज का उल्लेख मिलता है । प्रयाग प्रशस्ति अभिलेख के अनुसार महाकांतार के राजा व्याघ्रराज को परास्त कर समुद्रगुप्त ने व्याघ्रहंता की उपाधि धारण की थी।
3.वृषभराज(370ई.से400)— वृषभराज का किसी भी प्रकार का अभिलेख प्राप्त न होने के कारण इसका शासन काल स्पष्ट नहीं है। माना जाता है की व्याघ्रराज के बात वृषभराज द्वारा सत्ता का संचालन मात्र किया गया है।
4.वराहराज(400 ई.से 440ई.तक)— वराहराज को भावदत्त का पूर्वज माना जाता है तथा इसको नल वंश का वास्तविक संस्थापक माना जाता है। वराहराज के 29 सिक्के एडेगा गांव(कोंडागांव) से प्राप्त हुए है।वाकाटक वंश के राजाओं ने इसके शासन काल में बस्तर पर आक्रमण किया थे।
5.भवदत्त वर्मन–(440ई.से 465)
भवदत्त वर्मन को नल वंश का सबसे प्रतापी राजा माना जाता है।क्योंकि इसने भवदत्त वर्मन ने बस्तर एवं दक्षिण कोसल के वाकाटक नरेशों को पराजित कर अपने साम्राज्य का विस्तार नागपुर से बरार तक कर लिया था।राष्ट्रीय इतिहासकारों ने नल वंश शासकों में भवदत्त वर्मन को ही महत्व दिया है। ऋद्धिपूर अभिलेख के अनुसार भवदत्त वर्मन ने वाकाटक नरेश नरेंद्रसेन को पराजित कर उसकी राजधानी नंदिवर्धन पर अधिकार कर लिया।
भवदत्त वर्मन प्रतापी शासक होने के कारण इसका सम्बन्ध गुप्त शासकों के साथ मैत्रीपूर्ण था।भवदत्त वर्मन ने प्रयाग से अपना दानपत्र जारी करने वाला प्रथम नलवंशी शासक था। अमरावती के मोराशी अंचल से भवदत्त वर्मन का ताम्रपत्र मिला है।
भवदत्त वर्मन ने महाराज की उपाधि धारण की थी तथा भट्टारक की उपाधि धारण करने वाला इस अंचल का प्रथम शासक था।
6.अर्थपति भट्टारक–(465ई.से-480ई.)
भवदत्त वर्मन के 2 पुत्र थे। अर्थपति भट्टारक ओर स्कंदवर्मन। भवदत्त की मृत्यु के पश्चात उसका जेष्ठ पुत्र अर्थपति भट्टारक राजा बना । इसने भी अपने पिता के समान भट्टारक की उपाधि धारण की तथा अपने पिता के समान सोने के सिक्के भी चलाए।दक्षिण भारत के पल्लव वंश के राजा भट्टारक की उपाधि धारण करते थे।
केसरिबेडा अभिलेख में अर्थपति को ,महेश्वर, महासेनापति, सृष्टि राज विभव,त्रिपताका ध्वज ,नल नृपति, कुलानव्य,महाराज,भट्टारक आदि नामों से वर्णित है।
वाकाटक नरेश पृथ्वीसेन द्वितीय ने अर्थपति भट्टारक पर आक्रमण कर पराजित किया इस युद्ध में अर्थपति की मृत्यु हो गई तथा राजधानी पुष्करी को नष्ट भ्रष्ट कर दिया गया।
7.स्कंदवर्मन–(480ई.से 515ई.)
अर्थपति के मृत्यु के पश्चात उसका छोटा भाई स्कंदवर्मन पुष्करी का राजा बना तथा वाकाटक राजाओं द्वारा जीते प्रदेशों को पुनः प्राप्त किया ।स्कंदवर्मन ने पोड़ागड् में भगवान विष्णु का मंदिर बनाया । यह भगवान विष्णु का उपासक था।पोड़ागड् शिलालेख नलवंश का प्रथम शिलालेख है।
8.स्तम्भराज(515ई.से 550ई.)
दुर्ग के कुलिया अभिलेख के अनुसार वेंगी चालुक्य नरेश कीर्तिवर्मन प्रथम ने स्तम्भराज के शासन में नलों पर आक्रमण किया था।
9.नंदराज–(550 ई.से 585ई.)
नंदराज स्कंदवर्मा का पुत्र था । इसने नालंदा से शिक्षा ग्रहण किया था।
10.पृथ्वीराज(585ई.से625ई.)
इसके दो पुत्र विरुपाक्ष ओर विलासतुंग
11.विरुपाक्ष — विरुपाक्ष के शासन काल का कोई अभिलेख या प्रमाण अभी तक प्राप्त नहीं हुआ है।
12.विलासतुंग– राजिम अभिलेख के अनुसार विलासतुंग का शासनकाल 700ई.से 740ई. तक माना गया है।इसी अभिलेख में पृथ्वीराज ओर विरुपाक्ष के बारे में जानकारी मिलती है। 7-8वीं शताब्दी में विलासतुंग ने राजिम में राजीव लोचन मंदिर का निर्माण कराया था जिसे बाद में कल्चुरी शासक पृथ्वीदेव द्वितीय के सेनापति जगतपाल ने जीर्णोद्धार कराया था।राजीव लोचन मंदिर भगवान विष्णु का प्रसिद्ध मंदिर है। अतः कहा जा सकता है कि विलासतुंग वैष्णव धर्म का अनुयायी था।
13.पृथ्वीव्याघ्र–
पल्लव व्याघ्र नंदिवर्धन के उदयेदिरम दानपत्र से ज्ञात होता है कि विलासतुंग के पश्चात पृथ्वीव्याघ्र को उत्तराधिकार मिला।
इसके शासन के 150 वर्षों तक नल वंश का कहीं उल्लेख नहीं है।
14.भीमसेन– 920 ई. में गंजाम-कोरापुट में भीमसेन का ताम्रपत्र प्राप्त हुआ है।यह शिव का उपासक था।
15.नरेंद्र थबल— नरेंद्र थबल को नल वंश का अंतिम शासक माना जाता है।
नलवंश का विस्तार एवं संकुचन समय अनुसार होता रहा।और अंततः 12वी सदी में नल वंश पूर्णतः समाप्त हो गया।
छत्तीसगढ़ में नल वंशों ने मंदिर एवम स्थापत्य में बहुत विकास किया।
प्रमुख़ तथ्य —
वंश का नाम– नल वंश
राजधानी–पुष्करी (कोरापुट, ओडिशा)
आदिपुरुष– वृषध्वज(शिशुक)
वास्तविक संस्थापक– वराहराज
सोने के सिक्के— एडेगा(कोंडागांव)
नल वंशी राजाओं के प्रमुख अभिलेख—
1.पण्डियापथर अभिलेख
2.ऋद्धिपूर अभिलेख-भवदत्त वर्मन
3.केसरिबेडा अभिलेख-अर्थपति भट्टारक
4.पोड़ागढ़ अभिलेख–स्कंदवर्मन
5.राजिम अभिलेख–विलासतुंग
6.प्रयाग दानपत्र– भवदत्त वर्मन
कोंडागांव के समीप नलबाड़ी ग्राम नलवंश से सम्बंधित माना जाता है।
नल वंश के प्रमुख अधिकारी —
1.महामंडलेश्वर–1 लाख गाँवों का स्वामी
2.मांडलिक–मंडल प्रमुख
3.महागोष्ठ–प्रशासनिक सलाहकार समिति
4.प्रेगदा–मंत्री
PR CLASSES BALODA
PRVIN KUMAR PRADHAN