छत्तीसगढ़ का प्राचीन इतिहास भाग-3

      ★छत्तीसगढ़ का प्राचीन इतिहास भाग -3★

विषय सूची―

  • महाजनपद काल
  • मौर्य काल
  • सातवाहन वंश
  • कुषाण वंश
  • मेघवंश
  • वाकाटक वंश
  • गुप्त वंश

छत्तीसगढ़ प्राचीन इतिहास भाग 3 के अंतर्गत उपरोक्त वर्णित वंशो के शासन का क्रमबद्ध अध्ययन करेंगे। क्योंकि ये सभी वंश भारतीय इतिहास में भी महत्वपूर्ण स्थान रखते है तथा इन सभी वंशों का छत्तीसगढ़ में भी प्रत्यक्ष प्रभाव रहा है जो की छत्तीसगढ़ के प्रतियोगी परीक्षा के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण है। 

         ★महाजनपद काल★

शासन काल –छठवीं शताब्दी ई.पू.

  • भारतीय इतिहास में महाजनपद काल का विशेष महत्व है ,क्योंकि यहीं से भारतीय इतिहास का क्रमबद्ध वर्णन मिलता है।
  • महाजनपद काल में सम्पूर्ण भारत वर्ष 16 महाजनपदों में विभाजित था।
  • अंगुत्तर निकाय ,भगवती सुत्त पाली ग्रंथों में 16 महाजनपदों के उल्लेख मिलता है ।
  • पाणिनि ने 9 जनपदों का उल्लेख किया है।
  • महाजनपद काल बुद्ध के समकालीन राज्य थे।

छत्तीसगढ़ 16 महाजनपदों के चेदि महाजनपद के अंतर्गत आता है। 

चेदि महाजनपद की राजधानी शुक्तिमति तथा शासन क्षेत्र बुंदेलखंड का पठार प्रमुख था।

  • महाजनपद काल में छत्तीसगढ़ को चेदिस गढ़ कहा जाता था ,इतिहासकार हीरालाल शुक्ल के अनुसार इसी के अपभ्रंश से छत्तीसगढ़ का नामकरण हुआ है।

★मौर्यकाल 322-185 ई.पू.★

भारतीय इतिहास में मौर्य साम्राज्य की स्थापना महत्वपूर्ण घटनाक्रम में से एक है। इस समय भारत मगध पर शासन करना किसी भी शासक के लिए महत्वपूर्ण था। मगध में सर्वप्रथम हर्यक वंश के बिम्बिसार ने शासन किया इस वंश के बाद शिशुनाग वंश तथा तीसरे वंश के रूप में नंद वंश ने मगध पर शासन किया। नंद वंश के अंतिम शासक घनानंद को पराजित कर चंद्रगुप्त मौर्य ने मगध पर मौर्य साम्राज्य की स्थापना की । 

इसका विस्तार से वर्णन भारतीय प्राचीन इतिहास में करेंगे । 

छत्तीसगढ़ में मौर्य साम्राज्य के प्रभाव एवं पुरातात्विक साक्ष्य——

  •  चंद्रगुप्त मौर्य का साम्राज्य बंगाल की खाड़ी से अरब सागर के मध्यसागर के देशों तक फैला था किंतु इसके स्पष्ट  प्रमाण महाकोशल में नहीं मिलते है।
  • दक्षिण कोसल क्षेत्र सम्भवतः नंद-मौर्य साम्राज्य का अंग था इसकी पुष्टि चीनी यात्री व्हेनसांग के यात्रा वृतांत से होती है।
  • व्हेनसांग के अनुसार सम्राट अशोक ने दक्षिण कोसल में बौद्ध स्तूप का निर्माण कराया था।

छत्तीसगढ़ में मौर्य कालीन अभिलेख —

  • सरगुजा जिले के रामगढ़ पहाड़ी में जोगीमारा गुफा एवं सीताबेंगरा गुफा में पाली भाषा एवं ब्राह्मी लिपि में लेख लिखे गए है।
  • जोगीमारा गुफा में नर्तकी सुतनुका देवदासी एवं उसके प्रेमी देवदत्त का उल्लेख मिलता है।
  • डॉक्टर संतलाल कटारे ने इसका अध्ययन किया था।
  • सीताबेंगरा गुफा को एशिया की प्रथम नाटशाला मानी जाती है। यह पूर्णतः भारतीय मुक्तकाशी(open air theater) है।
  • सरगुजा के इन गुफाओं की खोज कर्नल आउसले(1848 ई.) तथा डॉ. ब्लास (1904 ई.) में की थी ।
  • कालिदास द्वारा मेघदूत नाटक की रचना इसी नाट्यशाला में की गई थी। कालिदास द्वारा उल्लेखित रामगिरि पहाड़ को रामगढ़ माना माना जाता है।
  • डॉक्टर रामेन्द्र नाथ मिश्र ने 1969-70 ई.आरंग तथा गुजरा गांव में ‘आहत सिक्कों’ की खोज की थी जो कि गोनगल श्रेणी के सिक्के थे।

मौर्यकालीन आहत मुद्रा प्राप्ति स्थल छत्तीसगढ़ में—

  • अकलतरा,ठठारी (जांजगीर-चांपा)
  • बरगांव,देवगांव (रायगढ़)
  • उड़ेला( रायपुर)

चांदी के सिक्के—अकलतरा-(259 चांदी के आहत सिक्के)

ठठारी –(253 चांदी के आहत सिक्के )

तारापुर(रायगढ़) से 15 चांदी के सिक्के मिले है।

मौर्य काल की एक प्रमुख घटना सरगुजा जिले से जुड़ी हुई है। सरगुजा जिले के मैनपाट के ग्राम सरभंजा में अगस्त्य मुनि का आश्रम माना गया है जिन्होंने हिन्दू धर्म का प्रचार दक्षिण भारत में की तथा नई तमिल भाषा का प्रचलन भी किया ।

                ★सातवाहन वंश★230 ई.पू.से 220 ई.तक

सातवाहन वंश की राजधानी —प्रतिष्ठान(महाराष्ट्र)

  • सातवाहन कालीन सिक्के छत्तीसगढ़ बालपुर के निकट महानदी में मिले है।(हाथी चिन्ह वाले चार वर्गाकार सिक्के।
  • मल्हार(बिलासपुर) में अपीलक की मुद्रा से स्पष्ट होता है कि छत्तीसगढ़ में सातवाहन साम्रज्य था ।
  • गुंजी (जांजगीर-चांपा) शिलालेख में राजवरदत्त श्री का लेख है जो कि ईसा प्रथम शताब्दी का है।
  • किरारी नामक ग्राम में सातवाहन कालीन काष्ठ स्तंभ प्राप्त हुआ है।
  • वर्ष 1921 में खोजा गया था वर्तमान में गुरु घांसीदास संग्रहालय रायपुर में सुरक्षित है।
  • इस काष्ठ स्तम्भ में सातवाहन कालीन कर्मचारियों तथा उनके पदनामों का उल्लेख किया गया है।
  • बिलासपुर में मल्हार के समीप बूढ़ीखार ग्राम के वैष्णव देवता की मूर्ति पर ईसा से पूर्व पहली शताब्दी के ब्राम्ही अक्षरों से अंकित लेख ज्ञात हुआ है।
  • यह लेख प्रभावती और भारद्वाजी नामक स्त्रियों के द्वारा मूर्ति निर्माण सूचित करती है।
  • दक्षिण कोसल की राजधानी के निकट एक पर्वत पर सातवाहन राजा ने एक सुरंग खुदवा कर प्रसिद्ध बौद्ध भिक्षु नागार्जुन के लिए एक पांच मंजिला भव्य संघाराम बनवाया था।
  • बिलासपुर एवं चकरबेडा में रोमन सिक्के की प्राप्ति हुई है।
  • आरंग में पश्चिमी क्षत्रप का 1 क्षत्रप 

सिक्का मिला है।

              सातवाहन कालीन सिक्के 

अमरावती शैली की सातवाहन कालीन मूर्ति 

 ,,,,,,,,कुषाण वंश ,,,(30 ई.से 225 ई.तक),,,,, 

भारतीय इतिहास के संदर्भ में—

  संस्थापक—कुजूल कडफाइसिस(30 ई.में)

  प्रतापी शासक—कनिष्क 

छत्तीसगढ़ में कुषाण वंश के प्रमाण—

  • कुषाण वंश के शासन का प्रत्यक्ष प्रमाण छत्तीसगढ़ में नहीं मिलता किन्तु तांबे के सिक्के बिलासपुर में मिले है।
  • इस वंश के सोने के सिक्के तेलिकोटा(रायगढ़) में मिले है।

    मेघवंश 

  संस्थापक–महाराज मेघ(मघ)

  • पुराणों के विवरणों से ज्ञात होता है कि गुप्तों के उदय के पूर्व कोसल राज्य में मेघवंश के शासक राज्य करते थे।
  • छत्तीसगढ़ में मेघवंशीय शासक शिवमेघ एवं यमेघ की जानकारी मिलती है।

                 

★वाकाटक वंश★

राजधानी —नंदिवर्धन(नागपुर)

संस्थापक –विंध्यशक्ति

शासनकाल–तीसरी सदी के मध्य से छठी सदी तक

शासन क्षेत्र—बरार,आन्ध्र प्रदेश,मध्यप्रदेश का बघेल खंड पठार,छत्तीसगढ़ का दक्षिण क्षेत्र ।

  • वायुपुराण एवं अजंता लेख के अनुसार विंध्यशक्ति वाकाटक वंश का संस्थापक राजा थे।
  • प्रथम राजा विंध्यशक्ति के लिए अजंता लेख में “वाकाटक वंशकेतु:” वाक्य का प्रयोग किया गया है।
  • इस वंश का नाम वाकाटक क्यों रखा गया इसका स्पष्ट प्रमाण नहीं है । 
  • पृथ्वीसेन द्वितीय को “वाकाटक वंश के खोये हुए भाग्य का निर्माता कहा जाता है।

 छत्तीसगढ़ में शासन करने वाले प्रमुख वाकाटक नरेश निम्न है—-

  1. प्रवरसेन प्रथम– विंध्यशक्ति के पुत्र प्रवसेन प्रतापी राजा हुआ जिसने नागपुर से दक्षिण कोसल तक अपना शासन स्थापित किया।  प्रमाण स्वरूप दुर्ग से प्राप्त अपूर्ण ताम्रपत्र में उल्लेखित।K
  2. महेंद्र सेन– हरिषेण कृत प्रयाग प्रशस्ति अभिलेख के अनुसार दक्षिण भारत अभियान के दौरान समुद्र गुप्त ने दक्षिण कोसल नरेश महेंद्र सेन को पराजित किया था।
  3. रुद्रसेन -द्वितीय— चंद्रगुप्त द्वितीय की पुत्री प्रभावती से विवाह किया । रुद्रसेन द्वितीय की अकाल मृत्यु हो जाने के कारण चंद्रगुप्त द्वितीय ने अपनी पुत्री के शासन में पूर्ण सहयोग किया था।
  4. प्रवरसेन द्वितीय—वाकाटक वंश के प्रतापी शासक। 

प्रवरपुर नगर की स्थापना की इसे अपना राजधानी बनाया।

‘सेतुबंध’ ग्रंथ की रचना की थी।इसे रावणवहो ग्रंथ भी कहा जाता है। प्रवरसेन वैष्णव धर्म का अनुयायी था।

इसके दरबार में महाकवि कालिदास रहते थे।

कालिदास ने मेघदूत काव्य की रचना सरगुजा के रामगढ़ की पहाड़ी में की थी।

पंडित मुकुटधर पांडे ने मेघदूत का छत्तीसगढ़ी में अनुवाद किया है ।

     5.नरेंद्रसेन— नलशासक भवदत्त वर्मन ने नरेंद्रसेन         को पराजित किया(ऋद्धिपुर ताम्रपत्र में उल्लेख)

     6.पृथ्वीसेन द्वितीय— केसरीबेड़ा अभिलेख के अनुसार राजा पृथ्वीसेन ने नलशासक अर्थपति भट्टारक को पराजित किया। इस युद्ध में अर्थपति भट्टारक की मृत्यु हो गई। इसने अपनी राजधानी पदमपुर को बनाया था। वाकाटक वंश के मुख्य वंश का अंतिम शासक था।

      7.हरिषेण– कालांतर में वाकाटकों के वत्सगुल्म शाखा के राजा हरिषेण ने दक्षिण कोसल में अधिकार कर लिया । 

       वत्सगुल्म शाखा का संस्थापक सर्वसेन प्रवरसेन का पुत्र था।

विशेष तथ्य—★वाकाटक वंश के शासकों का युद्ध प्रायः बस्तर/कोरापुट के नलशासकों के साथ होता रहता था ।

★ गुप्तों के साथ वाकाटक वंश के शासकों का वैवाहिक संबंध थे इससे ज्ञात होता है कि वाकाटक गुप्तों की अधीनता स्वीकार करते थे क्योंकि बहुत से अभिलेखों में वाकाटक स्वयं को राजा तथा गुप्तों को महाराजधिराज संबोधित करते थे।

छत्तीसगढ़ में वाकाटक वंश के प्रमाण–

       सिक्का— मोहला(दुर्ग) 

      ताम्रपत्र– राजिम(गरियाबंद) ,अड़भार(जांजगीर-चांपा), 

मोहला(दुर्ग) –प्रवरसेन का ताम्रपत्र प्राप्त हुआ है।

          ★गुप्तवंश★(319 ई.से 500ई. तक)

गुप्त काल को भारतीय इतिहास का स्वर्ण काल कहा जाता है। 

   संस्थापक– श्रीगुप्त

   राजधानी–पाटलिपुत्र 

  • गुप्तकाल में छत्तीसगढ़ का नाम दक्षिण कोसल या दक्षिणा पथ था।
  • गुप्तकाल में बस्तर को दंडकारण्य तथा सिहावा जंगल क्षेत्र को महाकांतार कहा जाता था।
  • समुद्रगुप्त—-गुप्त वंश के प्रतापी शासक समुद्रगुप्त के शासनकाल के अभिलेख हरिषेण कृत प्रयाग प्रशस्ति में सर्वप्रथम दक्षिण कोसल राज्य का उल्लेख मिलता है।
  • समुद्रगुप्त द्वारा दक्षिण कोसल के दो प्रमुख राजा वाकाटक नरेश महेंद्र सेन तथा महाकांतार के राजा व्याघ्रराज को पराजित किया था।
  • महासमुंद जिले के कोपरा गांव में समुद्रगुप्त के पत्नी रूपदेवी के साक्ष्य मिले है।
  • महासमुंद का नामकरण भी समुद्रगुप्त के साथ जोड़ा जाता है। कहा जाता है कि दक्षिण भारत विजय अभियान के दौरान समुद्रगुप्त की सेना कुछ समय के लिए यहाँ रुकी थी।
  • समुद्रगुप्त ने दक्षिण कोसल पर प्रत्यक्ष शासन नहीं किया बल्कि यहां के स्थानीय शासकों को मांडलिक के रूप में शासन करने दिया।

  •  समुद्र गुप्त का सिक्का
  • रामगुप्त— रामगुप्त का सिक्का बानबरद(दुर्ग) से प्राप्त हुआ है।
  • चंद्रगुप्त द्वितीय—चंद्रगुप्त द्वितीय की पुत्री प्रभावती का विवाह वाकाटक नरेश रुद्रसेन द्वितीय से हुआ था।
  • कुमारगुप्त—- कुमारगुप्त का रत्नजड़ित मयूर सिक्का आरंग से प्राप्त हुआ है।
  • भानुगुप्त– भानुगुप्त के एरण अभिलेख में शरभपुरीय शासक शरभराज का उल्लेख मिलता है।

विक्रमादित्य का धनुर्धारी सिक्का खरसिया से प्राप्त हुआ है।

छत्तीसगढ़ में प्रमुख गुप्तकालीन स्थापत्य—

केंवटिन मंदिर पुजारीपाली( बरमकेला, रायगढ़)

तालागांव का मंदिर (बिलासपुर)

गुप्तकाल की स्थापत्य कला को नागर शैली कहा जाता है।

अगले पोस्ट में छत्तीसगढ़ के स्थानीय राजवंश का अध्यापन करेंगे जो कि छत्तीसगढ़ psc ,vyapm की प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए बहुत ही महत्त्वपूर्ण है। 

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PR GK CLASSES BALODA 

संकलन– प्रवीण प्रधान

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