कुषाण वंश (30 ई.पू.से 375 ई.तक)

               कुषाण वंश(30 ई.पू.से 375 ई.तक)

  • संस्थापक– कुजूल कडफिसेस
  • वास्तविक संस्थापक–विम कडफिसेस
  • जाति- यूची/तोखरी 
  • राजधानी– पेशावर(पुरुषपुर)
  • दूसरी राजधानी–मथुरा
  • मूल क्षेत्र– मध्य एशिया(चीन),बैक्ट्रिया
  • प्रमुख अभिलेख– रैवतकअभिलेख

(अफगानिस्तान)

निर्माण- कनिष्क

स्थान–शुर्ख कोटल

(लिपी–किलक लिपी,भाषा–यूनानी) 

खोजकर्ता- विकनर

कुषाण वंश के प्रमुख राजा- 

1.कुजूल कडफिसेस– 

कुषाण वंश का संस्थापक 

राजधानी- तक्षशिला 

  • बैक्ट्रिया में यूनानी राजा(हरमियस) को पराजित कर कुषाण वंश की स्थापना की ।
  • महाधिराज की उपाधि धारण करने वाला प्रथम कुषाण शासक था।
  • तांम्बे के सिक्के जारी किए जिसमें हरमियस का चित्र अंकित था ।
  •  शासन क्षेत्र– काबुल, कंधार,तक्षशिला 

2.विमकडफिसेस–

  • कुषाण वंश का वास्तविक संस्थापक।
  • कुषाण वंश का प्रथम शासक जिसने  सोने की सिक्के जारी किए।
  • इसकी मुद्रा में शिव/ नंदी के चित्र अंकित थे ,अतः विमकडफिसेस शैव धर्म का उपासक था।
  • इसकी राजधानी पेशावर थी।
  • इसने सर्वलोकेश्वर और महेश्वर की उपाधि धारण किया था।

(Pic-wikimedia)

3.कनिष्क प्रथम–

  • कुषाण वंश का प्रतापी राजा कनिष्क प्रथम 
  • 78ई.शक संवत चलाया जिसे भारत सरकार द्वारा प्रयोग किया जाता है।
  • कनिष्क ने अपनी दूसरी राजधानी मथुरा को बनाया।
  • कनिष्क का राजवैद्य आयुर्वेद के महान विद्वान चरक थे।इन्होंने चरकसंहिता की रचना की 
  • महविभाषसूत्र को बौद्ध धर्म का विश्वकोश कहा जाता है इसके रचयिता वसुमित्र थे। 
  • कनिष्क का राजकवि अश्वघोष था ,जिसने बुद्धचरित की रचना की जिसे बौद्धों का रामायण कहा जाता है। 

     कनिष्क स्वयं को देवपुत्र  कहता था । यह उपाधि कनिष्क ने चीनियों से लिया था।

  • कनिष्क ने रेशम मार्ग को आरम्भ तथा विकसित भी किया और इस मार्ग को सुरक्षा भी प्रदान की । इस मार्ग से चीन मध्य एशिया के साथ रेशम का व्यापार करता था।चुंगी कर वसूल करने वाला शासक भी कनिष्क था।
  • गांधार शैली और मथुरा शैली का विकास कनिष्क के शासनकाल मे हुआ था। 
  • सर्वाधिक शुद्ध सोने के सिक्के जारी करने वाले कुषाण वंश के शासक थे।
  • कनिष्क के शासनकाल में वास्तुकला में सर्वाधिक विकास हुआ।

(Pic- wikimedia)

  • चीनी जनरल पेन चौआ ने कनिष्क को हराया था।
  • कनिष्क की मृत्यु 102 ई.में हुई।

छत्तीसगढ़ (दक्षिण कोसल) में कुषाण वंश का प्रभाव–

दक्षिण कोसल में कुषाण वंश के शासकों का प्रत्यक्ष प्रमाण नहीं मिलता है,किन्तु कुषाणों द्वारा जारी किए गए तांम्बे और सोने के सिक्के प्राप्त हुए है। अतः कहा जा सकता है, कि दक्षिण कोसल के स्थानीय राजवंश उनके अधीनस्थ शासन करते थे । 

  • तांबे के सिक्के बिलासपुर में मिले है।
  • इस वंश के सोने के सिक्के तेलिकोटा(रायगढ़) में मिले है।

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एरोमैटिक कोंडानार परियोजना 2021

 एरोमैटिक कोंडानार        परियोजना 2021

शुभारंभ– 20 जून 2021 

स्थान– कोंडागांव 

परियोजना लागत— 20 हजार करोड़ रुपये

उद्देश्य– सुगंधित फसलों को बढ़ावा देना 

आरक्षित जमीन– 2हजार एकड़ जमीन 

लाभान्वित परिवार– 1000परिवार  

विशेष तथ्य– 

20 जून 2021 को सामान्य सभा के वर्चुअल बैठक में राज्य के मुख्यमंत्री श्री भूपेश बघेल द्वारा एरोमैटिक   

कोंडानार परियोजना की घोषणा किया गया। इस परियोजना के अंतर्गत कोंडागांव जिले में 20000 एकड़ भूमि पर सुगंधित पौधों की खेती की जाएगी ।इस परियोजना में वन विभाग एवं कृषक वर्ग पात्र होंगे।इस परियोजना में वन विभाग के 575 एकड़ भूमि एवं 425 एकड़ व्यक्तिगत भूमि को सम्मिलित किया गया है। 

एरोमैटिक कोंडानार परियोजना का मुख्य उद्देश्य कोंडागांव जिले में सुगन्धित पौधों की खेती को बढ़ावा देना है । इस परियोजना में 250 परिवारों को प्रत्यक्ष तथा 750 परिवारों को परोक्ष लाभ मिलेगा।

एरोमैटिक कोंडानार परियोजना के अंतर्गत 7 सुगन्धित प्रजाति के पौधों का वृक्षारोपण किया जाएगा। इस परियोजना के अंतर्गत लेमन ग्रास, पामारोजा, पचौरी, मुनगा,आमाड़ी, वैटिवर,तुलसी की खेती की जाएगी । इस परियोजना में प्रति वर्ष एक एकड़ पर 1 लाख रुपये की आय हो सकती है। 

एरोमैटिक ऑयल प्रसंस्करण के लिए सन फ्लेक्स कम्पनी द्वारा कोंडागांव में प्रसंस्करण यूनिट लगाया जाएगा जिसकी क्षमता 5000 मीट्रिक टन होगी है और 250 लोगों को रोजगार भी मिलेगा।

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चेदि महाजनपद का इतिहास

मौर्य सम्राट अशोक ने महायुद्ध युद्ध के पश्चात कलिंग को विजय कर अपने साम्राज्य में सम्मिलित कर लिया था । इस युद्व में असीमित नरसंहार से आहत होकर मौर्य सम्राट अशोक ने बौद्ध धर्म ग्रहण कर हमेशा के लिए युद्व को त्याग दिया परिणामस्वरूप  अशोक के निर्बल उत्तराधिकारी कलिंग पर अपना अधिकार नहीं रख सके तथा उसकी मृत्यु के बाद कलिंग का राज्य पुनः स्वतंत्र हो गया। प्रथम शता.ईसा.पूर्व में कलिंग भारत का एक अत्यंत शक्तिशाली राज्य बन गया। इसी समय महामेघवाहन ने चेदि वंश की स्थापना कर कलिंग पर शासन करने लगा ।

इसी चेदि महाजनपद के अंतर्गत छत्तीसगढ़ राज्य भी सम्मिलित था।

चेदि ( chedi )भारत की एक अत्यंत प्राचीन जाति थी। 6 शता. ईसा.पूर्व में चेदि महाजनपद विद्यमान था, जिसमें संभवतः आधुनिक बुंदेलखंड तथा उसके समीपवर्ती प्रदेश शामिल थे। चेतिय जातक में इसकी राजधानी सोत्थिवती बताई गयी है। महाभारत में इसी को शुक्तिमती (शक्तिमती) कहा गया है। लगता है, कि इसी चेदि वंश की एक शाखा कलिंग गयी तथा उसने वहाँ एक स्वतंत्र राजवंश की स्थापना की।

खारवेल का इतिहास

कलिंग के चेदि राजवंश का संस्थापक महामेघवाहन नामक व्यक्ति था।अतः इस वंश का नाम महामेघवाहन वंश भी पङ गया। इस वंश का सर्वाधिक शक्तिशाली राजा खारवेल था। खारवेल प्राचीन भारतीय इतिहास के महानतम सम्राटों में से एक है। उङीसा राज्य के भुवनेश्वर (पूरी जिले) से तीन मील की दूरी पर स्थित उदयगिरि पहाङी की हाथीगुंफा से उसका एक बिना तिथि का अभिलेख प्राप्त हुआ है। इसमें खारवेल के बचपन, शिक्षा, राज्याभिषेक तथा राजा होने के बाद से 13 वर्ष तक शासन काल की घटनाओं का क्रमबद्ध विवरण दिया हुआ है। हाथीगुंफा अभिलेख खारवेल के राज्यकाल का इतिहास जानने का एकमात्र स्रोत है।

फेसबुक ,वाट्सएप्प ,इंस्टाग्राम पर प्रतिबंध

क्या भारत में फसेबूक, वाट्सएप्प, इंस्टाग्राम पर प्रतिबंध लगेगा? भारत में social मीडिया का भविष्य क्या होगा?

25 मई 2021को  फ़ेसबुक, वाट्सएप्प,इंस्टाग्राम, ट्विटर जैसे सोशल मीडिया साइट को सरकार की गाइडलाइंस को फॉलो करने का अंतिम दिवस था,तो क्या 26 मई 2021 से ये सभी सोशल मीडिया प्लेटफार्म पर हमारे देश मे हमेशा के लिए प्रतिबंध लग जायेगा। नए सूचना प्रौद्योगिकी नियमों के अनुसार इन सभी सोशल मीडिया प्लेटफार्म को 3 महीने का समय दिया गया था कि सरकार के नए नियमों का पालन करें । सिर्फ भारतीय कंपनी कू(KOO) इंडियन ट्विटर ने ही सरकार को अपना जवाब प्रस्तुत किया है किंतु अन्य सोशल मीडिया साइट द्वारा अंतिम तिथि तक किसी भी प्रकार का जवाब सरकार को प्रस्तुत नही किया है । तो सवाल ये उठता है कि क्या सरकार अपने सख्त नियमो का हवाला देके इन सभी सोशल मीडिया एप्पलीकेशन को देश मे प्रतिबंध कर देगी  या नियमो को पालन करने के लिए कुछ और समय देगी । तो चलिए जानते है कि  सराकर के नए गाइडलाइंस में क्या कहा गया है कि जिसके न मानने से सभी को प्रतिबंध का खतरा बन सकता है। 

 1. नए IT नियम क्या है?—

25फरवरी 2021 को The information technology (intermediary guidelines and digital media ethics code rules)2021  के अनुसार सभी सोशल मीडिया कम्पनियों को रेसिडेंट गरिएवंस ऑफिसर, चीफ compliance अफसर ओर नोडल कांटेक्ट पर्सन की नियुक्ति करना अनिवार्य है तथा भारतीय सीमा के अंदर ही इन अधिकारियों की नियुक्ति की जाएगी । इन अधिकारियों का मुख्य कार्य शिकायतों का निराकरण,सामग्री की निगरानी ,आपत्तिजनक पोस्ट को हटाने का कार्य करेंगे ।इन अधिकारियों की नियुक्ति के लिए सरकार ने सभी कंपनियों को 3 माह का समय दिया था,किन्तु अंतिम तिथि 25 मई 2021 तक भारतीय ट्विटर कंपनी koo को छोड़कर अन्य किसी भी कंपनी ने सरकार को जवाब नहीं दिया था। इसी नियम के तहत इन सभी कंपनियों पर प्रतिबंध लगने का खतरा मंडरा रहा है। 

2.सेक्शन 79 को हटाना–

सरकार ने यह बात भी स्पष्ट कर दिया है ,कि सोशल मीडिया कंपनियां इन नियमों का पालन नहीं करती है तो उन पर privecy प्रोटेक्शन section 79 of the information technology act  हटा देगी । 

आखिर ये सेक्शन 79 में क्या उल्लेख है समझते है। यदि कोई व्यक्ति किसी भी सोशल मीडिया साइट या एप्लीकेशन से कोई भी आपत्तिजनक पोस्ट करता है तो उसकी जिम्मेदारी उस कंपनी की होगी न कि किसी व्यक्ति विशेष की । क्योंकि यह सेक्शन 79 अब तक सभी सोशल मीडिया प्लेटफार्म को प्रोटेक्शन देती थी कि जो भी कोई गलत पोस्ट करता है या टिप्पणी करता है तो जिम्मेदारी भी उसी व्यक्ति की होती थी । यदि यह सेक्शन 79 सरकार हटा देती है तो किसी भी आपत्तिजनक पोस्ट के लिए कंपनी दोषी होगी ।

 3. सोशल मीडिया प्लेटफार्म द्वारा उठाये कदम– 

भारतीय ट्विटर कंपनी koo ने सरकार के गाइडलाइन का पालन करते हुए अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंप चुकी है। 

फेसबुक के अधिकारियों के अनुसार कहा गया है कि नए IT नियम का पालन किया जाएगा लेकिन कुछ और वक़्त चाहिए । 

ट्विटर ने सरकार से 6 माह का समय मांगा है नए IT नियमों के पालनार्थ के लिए । 

यह नियम सिर्फ सोशल मिडिया पर ही नही बल्कि OTT प्लेटफार्म पर भी लागू होंगे चाहे वह यु-ट्यूब हो या गूगल हो । सभी कंपनियों पर समान रूप से यह नियम लागू होंगे। 

4.नए नियम को लागू करने प्रमुख कारण– 

नए IT रूल्स में स्पष्ट लिखा गया है,कि सोशल मीडिया साइट्स को 3 अधिकारी नियुक्त करने होंगे क्योंकि ये 3 अधिकारी सोशल मीडिया साइट्स में आपत्तिजनक  पोस्ट की निगरानी करेंगे तथा उपभोक्ता के शिकायत का निराकरण 24 घण्टे में करेंगे । यह एक तरह का उपभोक्ताओं के लिए प्रोटेक्शन है।

क्योंकि अभी तक ऐसा नही होता था कि उपभोक्ता अपने शिकायत कंपनी के किसी व्यक्ति विशेष को कर सके किन्तु इस नियम के बाद कोई भी उपभोक्ता शिकायत करने में समर्थ होगा।

सभी सोशल मीडिया को सख्त निर्देश है, कि अपने कंपनी का भौतिक जानकारी उपलब्ध कराना अनिवार्य है ताकि उपभोक्ता कंपनी के अड्रेस में भी सम्पर्क कर सकें। 

26 मई 2021 के बाद सरकार क्या निर्णय लेगी यह बहुत ही महत्वपूर्ण है क्योंकि अभी भी सोशल मीडिया प्लेटफार्म सरकार से बातचीत कर बीच का रास्ता निकालने का प्रयास कर रहें है। 

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समुद्री तूफान “यास” की सम्पूर्ण जानकारी ।

चक्रवाती तूफान यास

कहर बरपाने आ रहा है चक्रवाती तूफान यास,बंगाल की खाड़ी में निम्न दाब पर बनने वाला सुपर साइक्लोन यास बहुत ही खतरनाक होते हुए ओडिशा- पश्चिम बंगाल की सीमा की ओर बढ़ रहा है। 26 मई 2021 को ओडिशा-पश्चिम बंगाल के तट पर टकराने की उम्मीद है,जब साइक्लोन तट पर टकराएगा उस समय यास की रफ्तार लगभग 150-155 km/घंटा हो सकती है। पिछले माह 17 मई  को ताउते तूफान की वजह पश्चिमी क्षेत्र मुम्बई,गुजरात, केरल में बहुत ही नुकसान हुआ था। इसी के मद्देनजर पश्चिम बंगाल,ओडिशा,असम राज्यों में रेड अलर्ट जारी कर दिया गया है एवं NDRF की टीम बचावदल के रूप में इन राज्यों ने तैनात की गई है। 

यास तूफान के बारे में विस्तार से चर्चा करेंगे क्योंकि प्रतियोगी परीक्षाओं में साइक्लोन के नामकरण, उत्पत्ति से सम्बंधित प्रश्न पूछे जाते है। इसलिए इस पोस्ट को अंत तक जरूर पढ़ें एवं पीडीएफ डाऊनलोड कर सुरक्षित कर लें।

चक्रवात क्या है?

चक्रवात निम्न वायुदाब के केंद्र होते हैं जिनके चारों ओर क्रमशः बढ़ते वायु दाब की समदाब रेखाएँ होती है। अर्थात घूमती हुई वायु राशि का नाम ही चक्रवात है। 

चक्रवात में वायु की दिशा परिधि से केंद्र की ओर होती है। चक्रवात जहाँ पहुंचते है वहाँ के वर्षा व तापक्रम की दशाओं को प्रभावित करते हैं तथा उस क्षेत्र के मौसम एवं जलवायु को पूर्णतः प्रभावित करते है।

चक्रवात के प्रकार–

1.उष्णकटिबंधीय चक्रवात–कर्क रेखा और मकर रेखा के मध्य उत्पन्न होने वाले चक्रवातों को उष्णकटिबंधीय चक्रवात कहते हैं। उष्णकटिबंधीय चक्रवातों को निम्न नामों से भी जाना जाता है— हरिकेन, टायफून,साइक्लोन,

ट्रोपिकल स्टोर्म,ट्रॉपिकल डिप्रेसन,साइक्लोनिक स्टॉर्म

2.शीतोष्णकटिबंधीय चक्रवात—यह चक्रवात 35-65 अंश अक्षांशों के मध्य उत्पन्न होते हैं। ये चक्रवात उत्तरी गोलार्द्ध में शीत ऋतु में उत्पन्न होते है तथा दक्षिणी  ध्रुव में वर्ष भर उत्पन्न होते रहते हैं।

चक्रवातों का नामकरण-

चक्रवातों का नामकरण एक व्यवस्थित पद्धति के अनुसार किया जाता है।सभी चक्रवातों का नामकरण विश्व मौसम विभाग के तहत पूरी दुनिया भर में फैले वार्मिंग सेंटर द्वारा किये जाते है। चक्रवातों के नामकरण का जिम्मा 13 देशों पर है। वर्तमान में ये 13 देश निम्नलिखित हैं–

1.भारत

2.पाकिस्तान

3.मालदीव

4.म्यामांर

5.बांग्लादेश

6.ओमान

7.श्रीलंका

8.थाईलैंड

9.ईरान

10.कतर

11.सऊदी अरब

12.यमन

13.यूएई 

कुल 64 देश चक्रवाती तूफान के नाम रखते है ।वर्तमान में उपरोक्त वर्णित 13 देश नामकरण  करते है। कुल 169 नामों की लिस्ट वर्तमान में तैयार की गई है।

चक्रवाती तूफान का नामकरण अल्फाबेट क्रम में किया जाता है। 

चक्रवातों के नामकरण की शुरुआत–वर्ष 2004 में भारत की पहल पर हिन्द महासागर क्षेत्र के आठ देशों ने चक्रवाती तूफानों के नामकरण की व्यवस्था शुरू की  थी। इसके तहत सदस्य देशों की ओर से पहले से सुझाये गए नामों में से एक का चयन किया जाता है।

इन सदस्यों के नाम है भारत,बांग्लादेश, पाकिस्तान, म्यामांर, मालदीव,श्रीलंका, ओमान ओर थाईलैंड ।

—तूफान ताऊ ते–

वर्ष 2021 में भारत मे आया पहला तूफान ताऊ ते है। 

समुद्री तूफान ताऊ ते भूमध्य रेखीय हिंदमहासागर के आसपास एक चक्रवाती हवाओं के क्षेत्र के रूप में विकसित हुआ तथा उत्तर दिशा की तरफ बढ़ते हुए कुछ दिनों में समुद्री तूफान में बदल गया। 17 मई 2021 को गुजरात के वेरावल तथा पोरबंदर तट पर रात 11 बजे टकराया था। अरब सागर के साइक्लोन इतने शक्तिशाली नहीं होते किन्तु ताऊ ते साइक्लोन बहुत ज्यादा शक्तिशाली तूफान था देश के पश्चिमी क्षेत्र  गुजरात, केरल,महाराष्ट्र में  तेज़ गरज के साथ भारी बारिश,आंधी तूफान से भारी नुकसान हुआ ।

ताऊ ते तूफान का नाम म्यामांर ने रखा था जिसका अर्थ होता है तेज़ आवाज़ करने वाली छिपकली।

ताऊ ते तूफान की तस्वीर 

—तूफान यास(yaas)–

चक्रवाती तूफान यास एक उष्णकटिबंधीय तूफान है ,जो कि बंगाल की खाड़ी में निम्न दवाब का क्षेत्र बनने के कारण पैदा हुआ है। भारतीय मौसम विभाग(IMD) द्वारा 23 मई को इसे नोटिस किया गया है। 25-26मई तक यह शक्तिशाली तूफान के रूप में तब्दील होने की संभावना है।

इस तूफान का नाम यास ओमान द्वारा रखा गया है जिसका अर्थ “निराशा” होता है।

कहाँ बना–बंगाल की खाड़ी में 23 मई को नोटिस किया गया । यह पश्चिम बंगाल के दीघा से 370 KM दूर बंगाल की खाड़ी में बना है।@pravinpradhan225

कैसे बना– बंगाल की खाड़ी में उष्णकटिबंधीय डिस्टर्बेंस के कारण बना है अर्थात बंगाल की खाड़ी में निम्न दाब के कारण बना है।

कहाँ टकराएगा—26 मई को पश्चिम बंगाल तट पर टकराने की संभावना ।

145-155 km/घण्टा हवा की रफ्तार हो सकती है। 

तेज़ गरज ,आंधी तूफान के साथ भारी बारिश की संभावना है। 

27 मई तक तूफान के कमजोर होने के आसार है ।

प्रभावित राज्य– ओडिशा, पश्चिम बंगाल,आंध्रप्रदेश, झारखंड, छत्तीसगढ़ ।

तूफान यास का छत्तीसगढ़ में प्रभाव–

बंगाल की खाड़ी में उठने वाले चक्रवातों से छत्तीसगढ़ प्रभावित रहता ही है। तूफान यास का भी व्यापक प्रभाव छत्तीसगढ़ में 26-27मई को देखने को मिल सकता है। इसलिए राज्य सरकार द्वारा छत्तीसगढ़ के महासमुंद जिला, बस्तर संभाग में भारी बारिश हेतु चेतावनी दी गई है।

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भूगोल एक परिचय — भाग 1

सामान्य भूगोल  

Upsc,Cgpsc cgvyapm एवं अन्य राष्ट्रीय एवं राज्यीय  परीक्षा के लिए भूगोल विषय बहुत ही महत्वपूर्ण है क्योंकि इस विषय से हमेशा से कई प्रश्न पूछे गए है। upsc एवं cgpsc में प्री एग्जाम एवं मुख्य परीक्षा में भूगोल विषय से संबंधित प्रश्न पूछे जाते है।

तो फिर प्रारंभ करते एक नए विषय के साथ हमारा यह ब्लॉग जहाँ भूगोल से संबंधित महत्वपूर्ण जानकारी,,,, ,, 

   सामान्य परिचय

सर्वप्रथम “भूगोल”शब्द का प्रयोग एक ग्रीक विद्वान इरिटस्थनीज ने किया था।

*Geography (भूगोल) शब्द एक ग्रीक भाषा है। दो मूल शब्द (Geo)पृथ्वी और(Grophos) वर्णन से मिल के बना है।

*सर्वप्रथम हिकेटियस ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक “जस पीरियड” (Ges periods)पुस्तक में पृथ्वी का क्रमबद्ध वर्णन किया इसलिए इन्हें “भूगोल का जनक” कहा जाता है।

*जैव भूगोल का विस्तार से अध्ययन करने के कारण “वर्तमान भूगोल का जनक” अलेक्जेंडर वॉल हम्बोल्ट को कहा जाता है । इनकी प्रसिद्ध पुस्तक कॉसमॉस में अनेकता में एकता का सिद्धांत दिया गया है।

वान हम्बोल्ट

*भूगोल के नामकरण एवं इस विषय को प्राथमिक स्तर पर व्यवस्थित स्वरूप प्रदान करने का श्रेय यूनान के निवासियों को जाता है।

*19वीं शताब्दी में भूगोल को स्वतंत्र  विषय के रूप में मान्यता मिली।

*20 वीं शताब्दी में भूगोल की दो विचारधारा प्रस्तुत की गई—

1.सम्भववाद–

इस मत के अनुसार अपने मनुष्य अपने पर्यावरण में परिवर्तन करने में समर्थ है तथा प्रकृति प्रदत्त अनेक संभावनाओं को अपनी इच्छा अनुसार उपयोग कर सकता है।

इस मत के प्रमुख समर्थक—वाइडल-डी-ब्लास,फेब्रे

2.निश्चयवाद– इस मत के अनुसार मनुष्य के सारे काम पर्यावरण द्वारा निर्धारित होते है,अतः मनुष्य को स्वेच्छा पूर्वक कुछ करने की स्वतंत्रता कम है।

समर्थक– रिटर,रेटजेल, एलन सेम्प्यूल, हटिंगटन

ये तो हो गया भूगोल विषय के कुछ सामान्य परिचय,,,,आज भी जब हम भूगोल शब्द का नाम सुनते ही हमारे मस्तक पटल पर ब्रह्मांड शब्द जरूर विचार में आता है। हम ब्रम्हांड की कल्पना करने लगते है,ओर कई सवाल हमारे मन में स्वतः आने लगते है। तो आइए समझते है ,ब्रह्मण्ड क्या है?

ब्रह्मांड— अस्तित्वमान द्रव्य एवं ऊर्जा के सम्मिलित रूप को ब्रह्मांड कहते है। अर्थात मनुष्य के मन में जो सम्पूर्ण विश्व का चित्र उभर के आया उसे ब्रह्मांड का नाम दे दिया गया।

ब्रह्मांड से संबंधित कुछ अवधारणाएं–

1.जियोसेंट्रिक(भुकेन्द्रित)(140ई.)- इस अवधारणा के प्रतिपादक खगोलशास्त्री क्लाडियस टॉलमी(मिश्र-यूनानी)है। इस अवधारणा के अनुसार पृथ्वी ब्रह्मांड के केंद्र में है तथा सूर्य व अन्य ग्रह इसकी परिक्रमा करते है।

बहुत समय तक लोग इस अवधारणा को मानते रहे है।

2.हेलियोसेंट्रिक (सूर्यकेन्द्रित)–पोलैंड के खगोलशास्त्री निकोलस कॉपरनिकस ने सन 1543ई.में हेलियो सेंट्रिक अवधारणा प्रस्तुत की जिसके अनुसार ब्रह्मांड के केंद्र में पृथ्वी नहीं बल्कि सूर्य है। इनकी यह अवधारणा सौरपरिवार तक ही सीमित थी।

1805 ई.में ब्रिटेन के खगोलशास्त्री विलियम हर्शेल ने अंतरिक्ष का अध्ययन कर बताया कि सौर मंडल आकाशगंगा का एक हिस्सा मात्र है,और ब्रह्मांड में अनगिनत आकाशगंगाएं Mविद्यमान है।

ब्रह्मांड उत्पत्ति के प्रमुख सिद्धांत–

1.महाविस्फोट सिद्धान्त(Big-bang theory)–

प्रतिपादक–एब जार्ज लेमेतेयर

इस सिद्धांत के अनुसार, ब्रह्मांड एक अत्यधिक सघन एवं उच्च तापमान वाली एकल पिंड के रूप में था जब इस पिंड में महाविस्फोट हुआ और यह छोटे छोटे टुकड़ों में बिखर गया जिससे कालांतर में ब्रह्मांडीय पिंडों एवं आकाशगंगाओं का निर्माण हुआ। इन्ही पिंडों के ठंडा होने से ग्रह एवं उपग्रहों का निर्माण हुआ। यह सिद्धांत अभी तक सर्वमान्य सिद्धान्त है। महाविस्फोट की घटना वैज्ञानिकों के अनुसार लगभग 13.7 अरब वर्ष पूर्व अनुमानित की गई है।

बिग-बैंग सिद्धांत ग्राफिक्स

2.स्थिर अवस्था संकल्पना–

प्रतिपादक–थॉमस  गोल्ड ,एवं हर्मन बॉडी 

इस सिद्धांत के अनुसार ब्रह्मांड का न तो आदि है ओर न  ही कोई अंत यह समयानुसार परिवर्तित होते रहता है।

3.दोलन सिद्धान्त–

प्रतिपादक-एलन संडेजा

ब्रह्मांड की उत्पत्ति का यह नवीन सिद्धांत है जिसके अनुसार ब्रह्मांड करोड़ो वर्षों के अंतराल में विस्तृत और संकुचित होते रहता है।120 करोड़ वर्ष पहले एक तीव्र विस्फोट के फलस्वरूप ब्रह्मांड का विस्तार हो रहा है तथा 290 करोड़ वर्ष बाद गुरुत्वाकर्षण की कमी के कारण ब्रह्मांड में संकुचन होगा तथा ब्रह्मांड संकुचित होकर एक बिंदु के आकार का हो जाएगा तब इसमे पुनः विस्फोट होगा। इस तरह का क्रम चलते रहता है। इसलिए इस सिद्धांत को दोलायमान सिद्धान्त कहा जाता है।

4.स्फीति सिद्धांत–

(एलेन गुथ) — सन 1980 में एलन गूथ ने इस सिद्धांत का प्रतिपादन किया था जिसके अनुसार ब्रह्मांड के जुड़े द्रव्यमान के घनत्व की तुलना में उसका वास्तविक घनत्व बहुत अधिक है।

अतः कहा जा सकता है ,कि  ब्रह्मांड में काले पदार्थ का अस्तित्व अधिक है। 

*नासा (NASA) द्वारा 30 जून2001 को डेविड विल्किंसन के नेतृत्व में बिग बैंग की पुष्टि हेतु मैप परियोजना का शुभारंभ किया गया।

*ब्रह्मांड के रहस्यों को जानने के लिए 30 मार्च 2010 ई.को यूरोपीयन सेंटर फॉर न्यूक्लियर रिसर्च ने जिनेवा में पृथ्वी की सतह से 50 से 127 मीटर नीचे 27.36 km लम्बे सुरंग में लार्ज हैड्र्न कोलाइजर (LHC) नामक महाप्रयोग सफलतापूर्वक किया गया । इसमे प्रोटॉन बीमों को लगभग प्रकाश की गति से टकराया गया तथा हिग्स बोसॉन(गॉड पार्टिकल) के निर्माण का प्रयास किया गया।

*ब्रह्मांड का व्यास 10का घातांक 8 प्रकाश वर्ष है।

*ब्रह्मांड में अनुमानित 100 अरब मंदाकिनी है।

*प्रत्येक मंदाकिनी में 100 अरब तारे होते है।

मंदाकिनी–

तारों का ऐसा समूह,जो धुंधला सा दिखाई पड़ता है तथा जो तारा -निर्माण की प्रक्रिया की शुरुआत का गैस पुंज है ,मंदाकिनी कहलाता है।

पृथ्वी की मंदाकिनी है दुग्धमेखला(आकाशगंगा)

पृथ्वी की मंदाकिनी को सबसे पहले गैलीलियो ने देखा था। पृथ्वी की नई ज्ञात मंदाकिनी ड्वार्फ मंदाकिनी है।

निहारिका(nebula)– यह एक ब्रह्मांडीय नर्सरी है जहां तारों का जन्म होता है। निहारिका में धूल और गैसों का बादल होता है।

निहारिका बनने के दो प्रमुख वजह है— 

1.ब्रह्मांड की उत्पत्ति

2.किसी विस्फोटक तारे से बने सुपरनोवा से। 

बेल ओर कर्क सुपरनोवा से बने निहारिका है।

निहारिका के प्रकार–

1.उत्सर्जन निहारिकाएं–

सबसे सुंदर और रंग बिरंगी। 

उदाहरण- चील एवं झील निहारिका

2.परावर्तन निहारिकाएं– यह तारों के प्रकाश को परावर्तित करती है।

उदाहरण-प्लेइडेस निहारिका

3.श्याम निहारिका–

ये अपने पीछे से आ रही प्रकाश को रोक देती हैं। इसलिए आकाश गंगा में बहुत दूर तक देख नहीं सकते।

4.ग्रहीय निहारिकाएं- 

इसका निर्माण उस वक्त होता है जब तक सामान्य तारा एक लाल दानव तारे में बदलकर अपने बाहरी तहों को उत्सर्जित करती है।इनका आकार गोल होता है।

ओरियन नेबुला– हमारी आकाशगंगा के सबसे शीतल और चमकीले तारों का समूह। 

आज के पोस्ट में इतना ही । अगले पोस्ट में सोलर सिस्टम(सौर परिवार) एवं भारत का भूगोल का अध्ययन करेंगे क्योंकि भारत का भूगोल सभी परीक्षा के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण विषय है,@pravinpradhan225 बहुत से प्रश्न प्रारंभिक एवम मुख्य परीक्षाओं में पूछे जाते है। 

पोस्ट पसन्द आया तो लाइक ,शेयर ओर कमेंट जरूर करें । आगे इससे भी अच्छे पोस्ट आने वाले है जो कि सभी परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण होगा। 

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राज करेगा राजपूत अपने आदर्श वाक्य को चरितार्थ करते हुए 41 वर्ष गौरवशाली सेवा के उपरांत रिटायर हुआ देश का पहला विध्वंसक युद्ध पोत आईएनएस राजपूत

“राज करेगा राजपूत” आईएनएस राजपूत अपने गौरवशाली 41 वर्ष पूर्ण करने के बाद दिनाँक 21/05/2021  को रिटायर हुआ।

आज दिनाँक 21 मई 2021 दिन शुक्रवार को देश का प्रथम विध्वंसक युद्ध पोत आईएनएस–राजपूत-D 51, 41 वर्ष की सेवा पूर्ण कर भारतीय नौसेना से रिटायर हो जाएगा।राजपूत सीरीज के आईएनएस-राणा डी 52 और आईएनएस-रणजीत-53 ही अब नौसेना को अपनी सेवा देंगे इसके पहले राजपूत श्रेणी के दो अन्य विध्वंसक पोत सेवामुक्त हो चुके है।आईएनएस- राजपूत नौसेना के दक्षिणी एवं पश्चिमी के दोनों बेड़ो में अपनी सेवा दे चुका है।

परिचय-

आईएनएस-राजपूत D-51  मुख्य रूप से रूस मूल का विध्वंसक पोत है। इसका मूल नाम नादेजनी था जिसका सामान्य अर्थ “उम्मीद” होता है।भारतीय नौसेना का पहला युद्ध पोत जिसे राजपूत रेजिमेंट के नाम से रखा गया है।

आईएनएस राजपूत का निर्माण— आईएनएस राजपूत का निर्माण यूक्रेन में किया गया था।इसका निर्माण कार्य वर्ष सितम्बर1976 में शुरू किया गया तथा वर्ष 1977 में इसे विमोचन किया गया था।

नौसेना में शामिल किया गया— 

30 सितम्बर 1980 को गुलाब मोहनलाल  हीरानंदानी के कमाडिंग में भारतीय नौसेना में आईएनएस राजपूत के नाम से सम्मिलित किया गया। इसके पहले कमांडिग ऑफिसर भी गुलाब मोहनलाल हीरानंदानी बने।

आदर्श वाक्य— राज करेगा राजपूत 

 महत्त्वपूर्ण तथ्य– 

आईएनएस राजपूत भारतीय नौसेना का प्रथम विध्वंसक पोत था।

ब्रह्मोस क्रूज मिसाइल का परीक्षण भी राजपूत में ही किया था।

मार्च 2007 में पृथ्वी-3 मिसाइल का परीक्षण भी राजपूत में किया गया था।

आईएनएस राजपूत एन्टी-विमान और एन्टी-पनडुब्बी मिसाइल लांच करने में सक्षम था।

आईएनएस राजपूत एन्टी सबमरीन,एन्टी एयरक्राफ्ट हमले करने में भी सक्षम था।

इसकी लम्बाई 147 मी.चौड़ाई 15.8 मी. इसका कुल भार 4974 टन है।इसकी चाल 35 नॉट(68 कि. मी./घंटा) 

आईएनएस राजपूत के प्रमुख मिशन–

ऑपरेशन कैक्टस– सन 1988 में मालदीव में तत्कालीन राष्ट्रपति मामून आयूब गययुम के तख्तापलट को रोकने के लिए भारतीय सेना द्वारा चलाया गया ऑपरेशन था। इस ऑपरेशन में आईएनएस राजपूत ने बंधकों को छुड़ाने के लिए अहम भूमिका निभाई थी

ऑपरेशन अमन– 

भारतीय शांति रक्षकों के बचाव के लिए श्रीलंका में चलाया गया ऑपरेशन में आईएनएस राजपूत ने हिस्सा लिया था।

ऑपरेशन पवन–

श्रीलंका में शांति स्थापना करने के लिए भारतीय सेना ड्यूटी कर रहे थे । इसी दौरान आईएनएस राजपूत समुद्री तट पर पेट्रोलिंग का जिम्मा संभाले हुए था।

ऑपरेशन क्रॉसनेस्ट–

लक्षद्वीप में चलाया गया ऑपरेशन क्रोसनेस्ट में आईएनएस राजपूत ने हिस्सा लिया था।

आईएनएस राजपूत द्वारा  कई प्रकार के द्विपक्षीय एवं बहुपक्षीय युद्ध अभ्यासों में हिस्सा लेना इसकी गौरवपूर्ण 41 वर्षों का प्रमाण है।

आईएनएस राजपूत अपने आदर्श वाक्य राज करेगा राजपूत  सार्थक करके अन्ततः दिनाँक 21/05/2021 को रिटायर हुआ ।

आईएनएस राजपूत की विदाई–

41 वर्ष के अपने गौरवपूर्ण सेवा के उपरांत आईएनएस राजपूत दिनाँक 21/05/2021 को सेवानिवृत्त किया गया।कोरोना काल के कारण नौसेना डॉकयार्ड विशाखापत्तनम में सादे समारोह में जिसमें कुछ अधिकारी एवं नाविकों के समक्ष सेवानिवृत्त किया गया।

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Ancient history chhattisgarh –part 5 छत्तीसगढ़ प्राचीन इतिहास भाग-5

छत्तीसगढ़ का प्राचीन इतिहास भाग-5

छत्तीसगढ़ इतिहास भाग- 4 के अंतर्गत हमने दक्षिण कोसल में शासन करने वाले स्थानीय प्राचीन राजवंशो का विस्तार से अध्ययन किया जिसके अंतर्गत हमने राजर्षि तुल्य कुल वंश,शरभपुरीय वंश एवम पाण्डुवंश का विस्तृत अध्ययन किया ।उपरोक्त तीनों वंश छत्तीसगढ़ के प्राचीन इतिहास के संदर्भ में बहुत ही महत्वपूर्ण है। आज के पोस्ट में हम छत्तीसगढ़ के निम्नलिखित वंशों का अध्ययन करेंगे—-

  दक्षिण कोसल के राजवंश

1.बाण वंश 

2.फणि नागवंश

बस्तर के प्रमुख राजवंश

1.नल वंश

2.छिन्दक नाग वंश

3.काकतीय वंश

छत्तीसगढ़ प्राचीन इतिहास भाग-5 के अंतर्गत सर्वप्रथम बाण वंश के इतिहास का अध्ययन करेंगे—

       1.बाण वंश

बाण वंश का प्रथम उल्लेख पाली(कोरबा) से प्राप्त अभिलेख से ज्ञात होता है। इनका शासन क्षेत्र मुख्यतः पाली ओर बिलासपुर के आसपास का क्षेत्र रहा है। दक्षिण कोसल के अंश क्षेत्र में ही इनका शासन था । 

पाली (कोरबा) अभिलेख से ज्ञात होता है ,कि इस वंश का संस्थापक महामंडलेश्वर मल्लदेव  को माना जाता है। बाण वंश के शासकों ने पाली को अपना राजधानी बनाया था इसके आसपास के क्षेत्र में ही शासन करते थे। अभिलेखीय स्रोतों के अनुसार इन्होंने लगभग 9 वीं सदी में इस क्षेत्र में शासन करते थे। बाण वंश के सभी शासकों में सबसे प्रतापी शासक विक्रमादित्य  था। राजा विक्रमादित्य ने पाली में शिवमंदिर का निर्माण किया जिसे बाद में कल्चुरी शासक जाजल्लदेव प्रथम ने जीर्णोद्धार करवाया था। पाली का शिवमन्दिर आज भी सुरक्षित है।

पाली में प्रस्तर मंदिर के निर्माण का श्रेय भी भी राजा विक्रमादित्य को ही जाता है।

त्रिपुरी के कल्चुरी शासक शंकरगण द्वितीय ने विक्रमादित्य को पराजित इस वंश के शासन को समाप्त कर दिया । बाद के वर्षों में इन्ही कल्चुरी शासकों ने दक्षिण कोसल में सबसे लंबा शासन किया।

शार्ट नोट्स–

वंश का नाम– बाण वंश 

शासन काल–9 वीं सदी

संस्थापक—महामंडलेश्वर मल्लदेव

प्रमुख़ शासक—राजा विक्रमादित्य

स्थापत्य कला— पाली का शिवमंदिर 

पाली में प्रस्तर मंदिर (निर्माता–राजा विक्रमादित्य)

जीर्णोद्धार कर्ता–जाजल्लदेव प्रथम) 

छत्तीसगढ़ के 2 प्रमुख स्थानीय  राजवंश जिन्हें नाग वंश  कहा जाता है।1.फणि नाग वंश 2.छिन्दक नाग वंश। दोनों ही नाग वंशों का शासन क्षेत्र भिन्न-भिन्न था तथा इनके उत्पत्ति के कारण भी अलग-अलग है। फणि नाग वंश छत्तीसगढ़ के कवर्धा क्षेत्र में तथा छिन्दक नाग वंश बस्तर क्षेत्र में शासन करते थे। इन दोनों ही वंशों का विस्तृत अध्ययन हम छत्तीसगढ़ के मध्यकालीन इतिहास में विस्तार से चर्चा करेंगे।

बस्तर का प्रमुख प्राचीन राजवंश

      1.नल वंश(4थी शताब्दी)

नलवंश बस्तर क्षेत्र का प्रमुख राजवंशों में से एक है । इस वंश के राजाओं ने अपने पराक्रम से दक्षिण कोसल के भी कुछ हिस्सों में शासन करते थे। नल वंश का इतिहास बहुत ही रोचक है। 

नल वंश का उल्लेख वायु पुराण एवं ब्रम्ह पुराण में मिलता है जिन्हें दक्षिण कोसल का शासक कहा गया है।प्रसिद्ध इतिहासकार डॉ.पी.एल. मिश्रा के अनुसार इनका शासन 4 शताब्दी में बस्तर क्षेत्र में था।

सबसे पहले समुद्रगुप्त के प्रयाग प्रशस्ति(इलाहाबाद) से ज्ञात होता है कि नल वंश का शासन बस्तर क्षेत्र में था।

वायुपुराण के अनुसार नलों को नैषध और दक्षिण कोसल का शासक कहा गया है। किंतु दंडकारण्य के नल पौराणिक नहीं अपितु पुरायुगीन है। नल शासकों की राजधानी पुस्करी(भोपालपट्टनम) कोरापुट(ओडिशा) थी।नल वंश का प्रथम शासक शिशुक(वृषध्वज) जिसे नल वंश का आदि पुरुष भी कहा जाता है ,को माना गया है।

किन्तु नल वंश का वास्तविक शासक वराहराज  था। 

प्रमुख नल वंशी शासकों के शासनकाल निम्नलिखित है।

1.शिशुक(वृषध्वज)-(290 ई.से 330ई)-  नल वंश का आदिपुरुष माना जाता है।

2.व्याघ्रराज-(330ई से 370ई.) समुद्रगुप्त के प्रयाग प्रशस्ति में व्याघ्रराज का उल्लेख मिलता है । प्रयाग प्रशस्ति अभिलेख के अनुसार महाकांतार के राजा व्याघ्रराज को परास्त कर समुद्रगुप्त ने व्याघ्रहंता की उपाधि धारण की थी।

3.वृषभराज(370ई.से400)—  वृषभराज का किसी भी प्रकार का अभिलेख प्राप्त न होने के कारण इसका शासन काल स्पष्ट नहीं है। माना जाता है की व्याघ्रराज के बात वृषभराज द्वारा सत्ता का संचालन मात्र किया गया है।

4.वराहराज(400 ई.से 440ई.तक)— वराहराज को भावदत्त का पूर्वज माना जाता है तथा इसको नल वंश का वास्तविक संस्थापक माना जाता है। वराहराज के 29 सिक्के एडेगा गांव(कोंडागांव) से प्राप्त हुए है।वाकाटक वंश के राजाओं ने इसके शासन काल में बस्तर पर आक्रमण किया थे।

5.भवदत्त वर्मन–(440ई.से 465)

भवदत्त वर्मन को नल वंश का सबसे प्रतापी राजा माना जाता है।क्योंकि इसने भवदत्त वर्मन ने बस्तर एवं दक्षिण कोसल के वाकाटक नरेशों को पराजित कर अपने साम्राज्य का विस्तार नागपुर से बरार तक कर लिया था।राष्ट्रीय इतिहासकारों ने नल वंश शासकों में भवदत्त वर्मन को ही महत्व दिया है। ऋद्धिपूर अभिलेख के अनुसार भवदत्त वर्मन ने वाकाटक नरेश नरेंद्रसेन को पराजित कर उसकी राजधानी नंदिवर्धन पर अधिकार कर लिया।

भवदत्त वर्मन प्रतापी शासक होने के कारण इसका सम्बन्ध गुप्त शासकों के साथ मैत्रीपूर्ण था।भवदत्त वर्मन ने प्रयाग से अपना दानपत्र जारी करने वाला प्रथम नलवंशी शासक था। अमरावती के मोराशी अंचल से भवदत्त वर्मन का ताम्रपत्र मिला है।

भवदत्त वर्मन ने महाराज  की उपाधि धारण की थी तथा भट्टारक की उपाधि धारण करने वाला इस अंचल का प्रथम शासक था।

6.अर्थपति भट्टारक–(465ई.से-480ई.) 

भवदत्त वर्मन के 2 पुत्र थे। अर्थपति भट्टारक ओर स्कंदवर्मन। भवदत्त की मृत्यु के पश्चात उसका जेष्ठ पुत्र अर्थपति भट्टारक राजा बना । इसने भी अपने पिता के समान भट्टारक की उपाधि धारण की तथा अपने पिता के समान सोने के सिक्के भी चलाए।दक्षिण भारत के  पल्लव वंश के राजा भट्टारक की उपाधि धारण करते थे।

केसरिबेडा अभिलेख  में अर्थपति को ,महेश्वर, महासेनापति, सृष्टि राज विभव,त्रिपताका ध्वज ,नल नृपति, कुलानव्य,महाराज,भट्टारक आदि नामों से वर्णित है।

वाकाटक नरेश पृथ्वीसेन द्वितीय ने अर्थपति भट्टारक पर आक्रमण कर पराजित किया इस युद्ध में अर्थपति की मृत्यु हो गई तथा राजधानी पुष्करी को नष्ट भ्रष्ट कर दिया गया।

7.स्कंदवर्मन–(480ई.से 515ई.)

अर्थपति के मृत्यु के पश्चात उसका छोटा भाई स्कंदवर्मन पुष्करी का राजा बना तथा वाकाटक राजाओं द्वारा जीते प्रदेशों को पुनः प्राप्त किया ।स्कंदवर्मन ने पोड़ागड् में भगवान विष्णु का मंदिर बनाया । यह भगवान विष्णु का उपासक था।पोड़ागड् शिलालेख नलवंश का प्रथम शिलालेख है।

8.स्तम्भराज(515ई.से 550ई.)

 दुर्ग के कुलिया अभिलेख के अनुसार वेंगी चालुक्य नरेश कीर्तिवर्मन प्रथम ने स्तम्भराज के शासन में नलों पर आक्रमण किया था।

9.नंदराज–(550 ई.से 585ई.)

नंदराज स्कंदवर्मा का पुत्र था । इसने नालंदा से शिक्षा ग्रहण किया था।

10.पृथ्वीराज(585ई.से625ई.) 

इसके दो पुत्र विरुपाक्ष ओर विलासतुंग 

11.विरुपाक्ष —  विरुपाक्ष के शासन काल का कोई अभिलेख या प्रमाण अभी तक प्राप्त नहीं हुआ है।

12.विलासतुंग– राजिम अभिलेख के अनुसार विलासतुंग का शासनकाल 700ई.से 740ई. तक माना गया है।इसी अभिलेख में पृथ्वीराज ओर विरुपाक्ष के बारे में जानकारी मिलती है। 7-8वीं शताब्दी में विलासतुंग ने राजिम में राजीव लोचन मंदिर का निर्माण कराया था जिसे बाद में कल्चुरी शासक पृथ्वीदेव द्वितीय के सेनापति जगतपाल ने जीर्णोद्धार कराया था।राजीव लोचन मंदिर भगवान विष्णु का प्रसिद्ध मंदिर है। अतः कहा जा सकता है कि विलासतुंग वैष्णव धर्म का अनुयायी था।

13.पृथ्वीव्याघ्र–

पल्लव व्याघ्र नंदिवर्धन के उदयेदिरम दानपत्र से ज्ञात होता है कि विलासतुंग के पश्चात पृथ्वीव्याघ्र को उत्तराधिकार मिला।

इसके शासन के 150 वर्षों तक नल वंश का कहीं उल्लेख नहीं है।

14.भीमसेन– 920 ई. में गंजाम-कोरापुट में भीमसेन का ताम्रपत्र प्राप्त हुआ है।यह शिव का उपासक था।

15.नरेंद्र थबल—  नरेंद्र थबल को नल वंश का अंतिम शासक माना जाता है।

नलवंश का विस्तार एवं संकुचन समय अनुसार होता रहा।और अंततः 12वी सदी में नल वंश पूर्णतः समाप्त हो गया। 

छत्तीसगढ़ में नल वंशों ने मंदिर एवम स्थापत्य में बहुत विकास किया।

प्रमुख़ तथ्य — 

 वंश का नाम– नल वंश

राजधानी–पुष्करी (कोरापुट, ओडिशा)

आदिपुरुष– वृषध्वज(शिशुक)

वास्तविक संस्थापक– वराहराज 

सोने के सिक्के— एडेगा(कोंडागांव)

नल वंशी राजाओं के प्रमुख अभिलेख—

1.पण्डियापथर अभिलेख

2.ऋद्धिपूर अभिलेख-भवदत्त वर्मन

3.केसरिबेडा अभिलेख-अर्थपति भट्टारक

4.पोड़ागढ़ अभिलेख–स्कंदवर्मन

5.राजिम अभिलेख–विलासतुंग 

6.प्रयाग दानपत्र– भवदत्त वर्मन

 कोंडागांव के समीप नलबाड़ी ग्राम नलवंश से सम्बंधित माना जाता है।

नल वंश के प्रमुख अधिकारी —

1.महामंडलेश्वर–1 लाख गाँवों का स्वामी

2.मांडलिक–मंडल प्रमुख

3.महागोष्ठ–प्रशासनिक सलाहकार समिति

4.प्रेगदा–मंत्री

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PRVIN KUMAR PRADHAN 

CHHATTISGARH ANCIENT HISTORY PART 4 छत्तीसगढ़ प्राचीन इतिहास भाग–4

छत्तीसगढ़ प्राचीन इतिहास भाग–4  

छत्तीसगढ़ प्रचीन इतिहास भाग- 3 में हमने भारतीय इतिहास के ऐसे प्रमुख राजवंशो का अध्ययन किया जिनका प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष शासन छत्तीसगढ़ में रहा । जिसके अंतर्गत हमने सातवाहन वंश,वाकाटक वंश,गुप्त वंश के दक्षिण कोसल में प्रभाव का पुरातात्विक साक्ष्यों के साथ  विस्तार से अध्ययन किया है।किन्तु छत्तीसगढ़ प्राचीन इतिहास भाग -4 के अंतर्गत हम  छत्तीसगढ़ के प्राचीन स्थानीय राजवंशों का अध्ययन करेंगे जो, कि दक्षिण कोसल में स्वतंत्र रूप से या किसी बड़े सम्राट के अधीनस्थ मांडलिक के रूप में राज्य करते थे। 

हमने आज के लिए जो विषय सूची बनाया वो इस प्रकार है।                                                   

         छत्तीसगढ़ के प्राचीन (स्थानीय)राजवंश

छत्तीसगढ़ स्थानीय राजवंश के अंतर्गत हम दक्षिण कोसल एवं बस्तर के राजवंशों का अलग अलग अध्ययन करेंगे ,क्योंकि तत्कालीन समय में दोनों का राज्यविस्तार भिन्न-भिन्न था ,जिससे कि अध्यापन के समय किसी प्रकार का संदेह उत्पन्न न हो।

      दक्षिण कोसल के स्थानीय राजवंश

  1. राजर्षि तुल्य कुल वंश
  2. शरभपुरीय वंश
  3. पाण्डुवंश/सोमवंश
  1. बाण वंश
  2. फणी नाग वंश 

      बस्तर के स्थानीय राजवंश

  1. नल वंश
  2. छिंदक नाग वंश
  3. काकतीय वंश


1.राजर्षि तुल्य कुल वंश–

राजर्षि तुल्य कुल वंश छत्तीसगढ़ में ज्ञात सभी वंशो में सबसे प्राचीन राजवंश माना जाता है।इस कुल का शासन काल पाँचवी शताब्दी के आसपास रहा होगा (कुछ इतिहासकार इनका शासन काल चौथी से छठवीं शताब्दी तक मानते है।)

इस वंश का ताम्रपत्र आरंग(रायपुर)  से प्राप्त हुआ है जिससे इस वंश बारे में पता चलता है। राजर्षि तुल्य कुल वंश की राजधानी आरंग रही होगी। आरंग ताम्रपत्र राजर्षि तुल्य कुल वंश के शासक भीमसेन द्वितीय ने सुवर्ण(सोन) नदी तट पर प्रदत्त किया था। उक्त ताम्रपत्र में हरिस्वामी एवं बपस्वामी को दोण्ड में स्थित भट्टपलिका ग्राम दान में देने का उल्लेख है।

आरंग ताम्रपत्र से भीमसेन द्वितीय और उसके पूर्व के 5 अन्य शासकों का नाम उल्लेख है—-शुर,दयित् वर्मा प्रथम,विभीषण, भीमसेन प्रथम,दयित वर्मा द्वितीय, भीमसेन द्वितीय ।

कलिंग के राजा खारवेल की प्रशस्ति पत्र में “राजर्षि वंश तुल्य कुल विनसृत” उल्लखित है। यह वाक्य इस वंश से संबंधित है या किसी अन्य वंश से अभी तक स्पष्ट नहीं हुआ है।  

शार्ट नोट्स के रूप में—

वंश–राजर्षि तुल्य कुल वंश

राजधानी—- आरंग 

प्रतापी शासक— भीमसेन द्वितीय

ताम्रपत्र—आरंग

विशेष तथ्य—राजर्षि तुल्य कुल वंश को सबसे प्राचीन राजवंश माना जाता है।

2.शरभपुरीय वंश–    छत्तीसगढ़ राज्य के कुछ हिस्से पर शरभपुरीय वंश का शासन था,शरभपुरीय वंश का शासन काल पांचवी और छठवीं सदी के आसपास था। शरभपुरीय राजवंश की राजधानी शरभपुर था किंतु शरभपुर वर्तमान में किस नगर को कहा गया है आज भी इतिहासकारों के लिए रहस्य बना हुआ है। अलग अलग इतिहासकारों के मतानुसार वर्तमान सारंगढ़ एवं संबलपुर(ओडिशा)  को शरभपुर नगर के लिए चिन्हित किया गया है। शरभवंश का संस्थापक शरभराज को माना जाता है तथा इनका ताम्रपत्र सारंगढ़ में प्राप्त होने के कारण सारंगढ़ को राजधानी माना जाता है।गुप्त संवत 191 अर्थात 510 ई.के एरण अभिलेख में शरभराज को गोपराज का नाना कहा गया है,जो कि गुप्त शासक भानुमंत का सामन्त था।

 एक अन्य ताम्रपत्र के अनुसार शरभवंश को अमरार्यकुल भी कहा गया है तथा व्याघ्रराज के मल्लार ताम्रपत्र में इन्हें अमरजकुल भी कहा गया है। शरभवंश कि राजाओं ने अपने परवर्ती राजाओं को श्रीपुरीय भी कहा है।शरभपुरीय राजाओं का राजचिन्ह गजलक्ष्मी था जो उनके समस्त दानपत्रों की महर पर पाया गया है।  

शरभपुरीय वंशी राजाओं का विवरण—

  1. शरभराज–

शरभवंश का संस्थापक राजा शरभराज था। एरण अभलेख(510ई) के अनुसार शरभराज को गोपराज का नाना कहा गया है।

     2.नरेंद्र 

 शरभराज का पुत्र नरेन्द्र था। शरभराज कि मृत्यु के बाद नरेंद्र शासक बना,इसके शासनकाल के 2 ताम्रपत्र मिले है एक सारंगढ़(रायगढ़) के ग्राम पिपरदुला में तथा दूसरा ताम्रपत्र कुरूद(धमतरी) में मिला है। 

पिपरदुला ताम्रपत्र शरभपुर स्थान से जारी की गई थी,यह ताम्रपत्र राजा नरेन्द्र के सिंहासन रूढ़ होने के तृतीय वर्ष में दिया गया था।इससे राहुदेव नामक भोगपति द्वारा एक ग्राम को दान में देने की पुष्टि महाराज नरेंद्र द्वारा की गई है।

दूसरे ताम्रपत्र को महाराजा नरेंद्र ने अपने शासन के 24 वें वर्ष में जारी किया था इसमें भी एक ब्राह्मण को ग्राम दान देने का विवरण मिलता है।

3.प्रसन्नमात्र— 

राजा नरेंद्र के बाद उसका पुत्र प्रसन्नमात्र शासक बना। इस वंश का प्रतापी शासक प्रसन्नमात्र को माना जाता है क्योंकि इसके बाद के राजाओं की वंशावली प्रसन्नमात्र से ही होती है अर्थात इसके उपरांत जितने भी अभिलेख इस वंश के प्राप्त हुए है उसमें वंशावलियों में वंश का प्रारम्भ प्रसन्नमात्र से किया गया है।प्रसन्नमात्र ने निडिला(लीलागर) नदी के किनारे प्रसन्नपुर नगर बसाया जिसे वर्तमान में मल्हार नगर के रूप में चिन्हित किया गया है। प्रसन्नमात्र ने अपने शासनकाल में स्वर्ण मुद्राएँ जारी की थी। प्रसन्नमात्र कि सिक्के सिरपुर ,कटक(ओडिशा) और चांदा( महाराष्ट्र ) से प्राप्त हुए है यह उसके राज विस्तार को दर्शाता  है। 

प्रसन्नमात्र के स्वर्ण सिक्के में गरूड़ शंख  चक्र अंकित थे।

प्रसन्नमात्र के उत्तराधिकारी के संबंध में इतिहासकारों में आज भी मतभेद है।प्रसन्नमात्र के दो पुत्र माने जाते है जयराज(जयराम) और मनमात्र दुर्गराज,किन्तु कहीं कहीं पर जयराज ओर मनमात्र को एक ही व्यक्ति माना गया है।

3.जयराज—

इतिहासकारों के अनुसार जयराज को ही प्रसन्नमात्र का उत्तराधिकारी माना गया है।मल्हार से प्राप्त ताम्रपत्र के अनुसार इसे दुर्ग शहर की स्थापना का श्रेय दिया जाता है इसलिए इसको अन्य नाम मनमात्र दुर्गराज से भी संबोधित  किया गया है। जयराज ने अपने सिक्कों में गजलक्ष्मी का अंकन कराया था।जयराज के द्वारा शरभपुर से तीन ताम्रपत्र जारी किए है दो मल्हार(बिलासपुर) से ओर एक आरंग(रायपुर) से ।जयराज के 3 पुत्र थे—सुदेवराज,प्रवरराज और व्याघ्रराज ।

4.सुदेवराज—-

जयराज के बाद उसका पुत्र सुदेवराज शरभपुर का उत्तराधिकारी बना और शासन करने लगा । इस वंश के सभी शासकों को सर्वाधिक ताम्रपत्र सुदेवराज के प्राप्त होते है। इसके द्वारा 6 ताम्रपत्र शरभपुर और सिरपुर से जारी किए गए थे। सुदेवराज के शासन काल में पांडुवंशी शासक इन्द्रबल राज उसका सामन्त था।कौवाताल अभिलेख (महासमुंद) में इन्द्रबल को सुदेवराज का सामन्त कहा गया है।

5.प्रवरराज प्रथम–

सुदेवराज राज जब शरभपुर का शासक बना तब उसका छोटा भाई प्रवरराज प्रथम सिरपुर  में सामन्त के रूप में शासन करने लगा तथा राज्य भी अर्जन करने लगा। प्रवरराज प्रथम ने पहली बार सिरपुर को अपनी राजधानी बनाया,किन्तु अल्प काल में मृत्यु हो जाने के कारण बाद में सुदेवराज सिरपुर का शासक बना। प्रवरराज प्रथम ने अपने शासनकाल में 2 ताम्रपत्र मल्हार तथा सारंगढ़ से जारी किए थे।प्रसन्नमात्र का तीसरा पुत्र व्याघ्रराज प्रवरराज के सामन्त के रूप में कार्य करता था इसका ताम्रपत्र मल्हार से प्राप्त हुआ है।

6.प्रवरराज द्वितीय—-

प्रवरराज द्वितीय को शरभवंश का अंतिम शासक माना जाता है। सुदेवराज के सामन्त इन्द्रबल ने इसकी हत्या कर सिरपुर में पाण्डुवंश की स्थापना की ।

शरभवंश के बारे में महत्वपूर्ण तथ्य—

शासन काल–5 वीं से 6 वी सदी तक

राजधानी–शरभपुर 

संस्थापक—शरभराज

प्रमुख धर्म–वैष्णव

स्थापित प्रमुख नगर—प्रसन्नपुर( मल्हार)

अंतिम शासक—प्रवरराज द्वितीय 

अन्य नाम—अमरजकुल,अमरार्य कुल

विशेष— इनके अभिलेख में किसी सन या संवत का उल्लेख नहीं है।

अपने ताम्रपत्रों में स्वयं को परमभागवत कहते थे।

3.पाण्डुवंश(सोमवंश) 

शरभपुरीय वंश के शासन के पश्चात दक्षिण कोसल पर शासन करने वाला महत्वपूर्ण राजवंश पाण्डुवंश को माना जाता है। पाण्डुवंश को ही सोमवंश कहा जाता है। अमरकंटक(मध्यप्रदेश) क्षेत्र सोम क्षेत्र कहलाते थे,किन्तु पाण्डुवंश स्वंय को पांडवों से संबंध बतलाते थे और स्वयं को पाण्डुवंशी कहते थे।इस वंश के शासक तीवर देव के राजिम प्लेट 1785 ई. प्राप्त हुआ जिसमें इस वंश के इतिहास के बारे में पता चलता है।छत्तीसगढ़ में शासन करने के पूर्व पाण्डुवंश का शासन मेकल अंचल में था ।पाण्डुवंशियो ने पहली बार इस प्रदेश को कोसल प्रदेश कहा और स्वयं को कोसलाधिपति से सम्मानित किया।इनके ताम्रपत्र सिरपुर से जारी किए गए है इसलिए सिरपुर को इनकी राजधानी मान्य की गई है। पाण्डुवंशी अपनी अभिलेखों में दो भिन्न लिपियों का प्रयोग करते थे ,ताम्रपत्रों में पेटिका शीर्ष लिपि तथा शिलालेखों में कीलाक्षर लिपि का प्रयोग करते थे।

पाण्डुवंश/सोमवंश के छत्तीसगढ़ में चार प्रमुख शाखा थे जो कि निम्न है—

.सिरपुर का पाण्डुवंश

२.मैकल का सोमवंश

३.कांकेर के सोमवंश

४.ओडिशा का सोमवंश 

१.सिरपुर का पाण्डुवंश(सोमवंश-)

सिरपुर के पाण्डुवंश सोनपुर -बलांगीर(ओडिशा) के सोमवंश से भिन्नता प्रकट करने के लिए ये स्वयं को पाण्डुवंशी कहने लगे ओर इसी नाम से दक्षिण कोसल में शासन करने लगे । सिरपुर( महासमुंद ) को अपनी राजधानी बनायी ओर यही से शासन करने लगे।इस वंश का आदिपुरुष कालिंजर शिलालेख के अनुसार उदयन को कहा जाता है ।उदयन का पुत्र इन्द्रबल जो कि दक्षिण कोसल में पाण्डुवंश का संस्थापक बना।

 6वी से 7वी सदी तक पाण्डुवंशी शासकों ने दक्षिण कोसल पर शासन किया।

           प्रमुख शासक

1.उदयन– पाण्डुवंश का आदिपुरुष।

उदयन का ताम्रपत्र या शिलालेख छत्तीसगढ़ में नही मिला है ।

इन्द्रबल के अभिलेख से ज्ञात होता है ,कि उदयन उसका पिता था।

कालिंजर अभिलेख के अनुसार उसका कार्यक्षेत्र सेंट्रल प्रोविंस के जुड़े भाग तक था।

2.इन्द्रबल राज—

इन्द्रबल उदयन का पुत्र तथा शरभपुरीय शासक सुदेवराज का सामन्त था। इसने प्रवरराज द्वितीय की हत्या कर सिरपुर में पाण्डुवंश की स्थापना की।

इसलिए इसे पाण्डुवंश का छत्तीसगढ़ में वास्तविक संस्थापक माना जाता है। इन्द्रबल का अन्य नाम भरतबल भी है।अमरार्य कुल की राजकुमारी लोकप्रकाशा के साथ इसका विवाह हुआ था।इन्द्रबल ने इंद्रपुर नामक शहर को बसाया जो कि वर्तमान खरौद(जांजगीर-चांपा) है।

इन्द्रबल के चार पुत्र थे -1.नंनराज प्रथम 2.सुरबल 3.ईशान देव 4.भवदेव 

3.नंनराज प्रथम

 नंनराज प्रथम इन्द्रबल का उत्तराधिकारी बना। इसने स्वयं को सिरपुर का शासक घोषित किया और अपने भाईयों को मंडलाधिपति के रूप में स्थापित भी किया ।इसने राजाधिराज या अधिराज की उपाधि धारण की थी।

4.ईशान देव—

इन्द्रबल का पुत्र तथा खरौद का मंडलाधिपति था। इसने खरौद में लक्ष्मणेश्वर मंदिर का निर्माण किया। इस मंदिर में 1 लाख चावल चढ़ाने की परंपरा है। यह एक शिव मंदिर है।

5.महाशिव तीवर देव—

नंनराज का पुत्र एवं तीवर देव सिरपुर का उत्तराधिकारी बना । महाशिव तीवर देव को पांडु वंश का उत्कर्ष काल कहा गया है। इसके 3 ताम्रपत्र से इसके शासन की पुष्टि होती है।महाशिव तीवर देव नाम का वर्णन ताम्रपत्रों में है अर्थात महाशिव शाही उपाधि थी ।

महाशिव तीवर देव सकल कोसलाधिपति  उपाधि धारण करने वाला प्रथम पाण्डुवंशी शासक था। इसका शासन क्षेत्र दक्षिण कोसल से मैकल श्रेणी ओर ओडिशा के कुछ हिस्सों तक था।महाशिव तीवर देव विष्णु धर्म का अनुयायी था इसलिए परमवैष्णव कि उपाधि भी धारण की थी ।इसने अपनी मुद्रा मे गरूड़ उत्कीर्ण कराया था।बोड़ा ताम्रपत्र(रायगढ़) का सम्बंध महाशिव तीवर देव से है।तीवर देव के पुत्र और दामाद दोनो का नाम नंनराज था इसलिए अपने दामाद को पंचमहाशब्द की उपाधि दी थी । महाशिव तीवर देव विष्णु कुण्डी माधव वर्मन प्रथम से युद्ध करते हुए मारा गया। 

6.नंनराज द्वितीय–

अड़भार ताम्रपत्र के अनुसार तीवरदेव का पुत्र नंनराज द्वितीय था।नंनराज द्वितीय विष्णु का उपासक था।वर्तमान महाराष्ट्र के वर्धा नदी तक नंनराज द्वितीय ने साम्राज्य विस्तार किया था।

नंनराज द्वितीय ने कोसलमंडलाधिपति की उपाधि धारण किया था।इसके सम्राज्य विस्तार में देवरक्षित नाम का प्रमुख योगदान था ।

7.चंद्रगुप्त —

नंनराज द्वितीय निःसन्तान होने के कारण महाशिव  तीवरदेव का छोटा भाई चंद्रगुप्त दक्षिण कोसल का शासक बना। सिरपुर अभिलेख से चंद्रगुप्त की जानकारी मिलती है। चंद्रगुप्त ने माधव वर्मन द्वारा जीते राज्यों को अपने पराक्रम से पुनः प्राप्त किया। मात्र 5 वर्ष शासन करने के पश्चात अपने पुत्र हर्षगुप्त को उत्तराधिकारी नियुक्त किया।

8.हर्षगुप्त—

चंद्रगुप्त का पुत्र हर्षगुप्त दक्षिण कोसल का राजा बना। इसका विवाह मगध के मौखरी नरेश सूर्यवर्मन की पुत्री वासटा देवी से हुआ। हर्षगुप्त की स्मृति में रानी वासटा देवी ने सिरपुर में लक्ष्मण मंदिर का निर्माण किया जो कि एक विष्णु मंदिर है। इस मंदिर का निर्माण लगभग 600 ई. में हुआ है। लक्ष्मण मंदिर लाल ईंट से निर्मित हुआ है जो कि उत्तर गुप्तकाल के वास्तुकला का श्रेष्ठ उदाहरण है। नेपाल नरेश जयदेव के शिलालेख मे इसके नाम का वर्णन मिलता है। लक्ष्मण मंदिर सिरपुर के शिलालेख के अनुसार हर्षगुप्त की उपाधि प्राक परमेश्वर एवं त्रिकलिंगाधिपति थी। हर्षगुप्त वैष्णव धर्म का उपासक था।

हर्षगुप्त की मृत्यु के पश्चात उसका पुत्र महाशिवगुप्त बालार्जुन दक्षिण कोसल का शासक बना।

9.महाशिव गुप्त बालार्जुन—

महाशिवगुप्त बालार्जुन राजा हर्षगुप्त एवं रानी वासटा देवी का पुत्र था । सिरपुर अभिलेख के अनुसार इसने राजधानी सिरपुर से 595 ई.-655 ई. तक लगभग 60 वर्ष तक लंबा शासन था। इसके शासनकाल को देख के ही पता चलता है कि यह एक प्रतापी ओर जनप्रिय शासक था । बचपन से ही धनुर्विद्या में निपुण होने के कारण इसका नाम बालार्जुन हुआ। दक्षिण कोसल के साथ- साथ विंध्यप्रदेश दुर्ग,रायपुर,बिलासपुर ओर ओडिशा के संबलपुर तक इसका शासन था।

चीनी यात्री व्हेनसांग इसी के शासनकाल में 639ई.में छत्तीसगढ़ प्रवास में आया था। व्हेनसांग की रचना सी-यू-की में इस क्षेत्र का नाम की-या-स-लो वर्णित है।महाशिवगुप्त बलार्जुन शैव धर्म का उपासक था। किंतु सभी धर्मों को इसने संरक्षण दिया था,इसके शासनकाल में सिरपुर बौद्ध धर्म का प्रमुख केंद्र था।महाशिवगुप्त बालार्जुन की मुद्रा पर गजलक्ष्मी के स्थान पर कुकुदमाल ,वृषभ तथा त्रिशूल का अंकन था। इसके शासन काल से यह वंश पाण्डुवंश से सोमवंश के रूप में प्रसिद्ध हुआ।महाशिवगुप्त बालार्जुन के दरबार मे महान कवि ईशान थे।

ऐहोल अभिलेख (634ई.) के अनुसार बालार्जुन पुलकेशिन द्वितीय की अधीनता स्वीकार किया था। महाशिवगुप्त बालार्जुन के शासनकाल में उत्तर भारत मे हर्षवर्धन ओर दक्षिण भारत मे पुलकेशिन द्वितीय(चालुक्य) एवं नरसिंह वर्मन प्रथम( पल्लव) वंश का साम्रज्य था।सिरपुर में 27 ताम्रपत्र महाशिवगुप्त बालार्जुन का के मिले है, किंतु सिक्का एक भी नही मिला है।महाशिवगुप्त बालार्जुन के भाई रण केसरी ओर एक पुत्र शिवनंदी का पता चलता है। महाशिवगुप्त बालार्जुन के शासन काल को दक्षिण कोसल का स्वर्ण युग कहा जाता है।

महाशिवगुप्त बालार्जुन के पश्चात दक्षिण कोसल पर नल वंशी शासको ने शासन किया।सिरपुर में प्राप्त बौद्ध प्रतिमा

सिरपुर लक्ष्मण मंदिरश्री गंधेश्वर नाथ महादेव मंदिर सिरपुर

२.मैकल का पाण्डुवंश

आधुनिक अमरकंटक(मध्यप्रदेश) का क्षेत्र मैकल क्षेत्र कहलाता था। यहाँ से इस वंश के बारे में पता चलता है। भरत बल के बहमनी ताम्रपत्र से इस वंश के बारे में जानकारी मिलती है।

बहमनी ताम्रपत्र में जयबल,वत्सबल,नागबल,भरतबल, सुरबल का उल्लेख है।

बहमनी ताम्रपत्र में नागबल के लिए  महाराज उपाधि का प्रयोग हुआ है।मल्हार से प्राप्त एक ताम्रपत्र में भरतबल के पुत्र शुरबल का उल्लेख मिलता है।

कलचुरियों से सर्वप्रथम संघर्ष करने वाला वंश यही था।

3.कांकेर का सोमवंश—

कांकेर के सोमवंश का शासन काल लगभग 1191 ई.से 1320 ई तक था। कांकेर के सोमवंश के संस्थापक सिंहराज को माना जाता है। इस वंश के अन्य राजाओं में व्याघ्रराज ,वोपदेव ,कर्णराज का उल्लेख सिहावा ताम्रपत्र में मिलता है तथा कृष्णराज एवम सोमदेव का भी संबंध कांकेर के सोमवंश से किया जाता है।

कांकेर से एक शासक भानुदेव का लेख मिलता है।

4.ओडिशा के सोमवंश—

ओडिशा सोमवंश के राजाओं को इतिहासकारों ने कलिंग का सोमवंश भी कहा है क्योंकि सोमवंशी राजा स्वयं को त्रिकलिंगाधिपति या कोसलेंद्र उपाधि से संबोधित करते थे। इस वंश का संस्थापक शिवगुप्त को माना जाता है तथा इनका प्रमुख शासन क्षेत्र कोसल,उत्कल ओर कलिंग क्षेत्र था एवं इनका शासन काल 9वीं से 11 वीं सदी तक था। इस वंश में राजाओ के 2 ही नाम चलते थे महाशिवगुप्त ओर महाभवगुप्त 

इनकी राजधानी सिरपुर थी।

 इस वंश के प्रमुख शासक—

शिवगुप्त—- इस वंश का संस्थापक। इतिहासकार विष्णु मिराशी के अनुसार इसके शासन में कल्चुरी राजा मुग्ध तुंग ने कोसल पर आक्रमण किया था और पाली क्षेत्र में विजय प्राप्त किया था ।

जन्मजेय (महाभवगुप्त प्रथम )—शिवगुप्त के बाद उसका पुत्र जन्मजेय महाभवगुप्त प्रथम राजा बना इसका अन्य नाम धर्मकंदर्प एवं स्वभाव तुंग  था । महाभवगुप्त प्रथम के 13 ताम्रपत्र प्राप्त हुए है।इन ताम्रपत्रों में इसे परमभट्टारक, महाराजधिराज, परमेश्वर, सोमकुलतिलक की उपाधियों से उल्लेखित किया गया है। 

इसने कोसल,उत्कल एवं कलिंग पर शासन करता था इसलिए कोसलेंद्र एवं त्रिकलिंगाधिपति की उपाधि धारण किया हुआ था। 

ययाति-(महाभवगुप्त प्रथम)— 

इसका शासन काल 970 ई से 1000 ई. माना गया है।ययाति के प्रारंभिक ताम्रपत्र विनितपुर (ओडिशा) से जारी किए गये थे तथा उसके शासन के 24 वें एवं 28 वें वर्ष में दानपत्र ययातिनगर से दिए गए है।  अतः महाभवगुप्त को ययातिनगर बसाने का श्रेय जाता है।

भीमरथ-(महाभवगुप्त द्वितीय)–   भीमरथ महाभवगुप्त द्वितीय के नाम से सिंहासनरूढ़ हुआ। इसका शासनकाल-1000 ई से 1015 ई तक माना गया है।इसकी राजधानी ययातिनगर थी।

धर्मरथ– (महाशिवगुप्त द्वितीय)

भीमरथ का उत्तराधिकारी धर्मरथ हुआ।इसका शासन काल 1015 ई.से 1020 तक माना जाता है।अल्पकाल में निःसन्तान मृत्यु होने पर इसका भाई  नहुष राजा बना।

नहुष(महाभवगुप्त तृतीय)–  

इसका शासन कठिनाई पूर्ण था। शत्रुओं के आक्रमण के कारण उसके राज्य के कुछ भागों पर  शत्रुओं ने अधिकार कर लिया। 

 इन्द्रश्च– कल्चुरी, भोज,परमार, चोल वंश के राजाओं द्वारा कलिंग,उत्कल तथा ओड्र के विजय अभिलेख में इसका नाम उल्लेखित है।

ययाति चंडीहर—(महाशिवगुप्त तृतीय)—ययाति चंडीहर प्रतापी राजा था । इसने अपने खोये साम्रज्य को शत्रुओं से मुक्त किया।

उद्योगकेसरी(महाभवगुप्त चतुर्थ)—उद्योग केसरी 1055 ई में राजा बना। इसने डाहल, ओड्र तथा गोंड़ नरेशों से विजय प्राप्त की थी

इस वंश का अंतिम प्रतापी शासक था जिसने उत्कल एवं कोसल दोनों राज्यों में शासन किया।

कर्ण केसरी—

इस वंश का अंतिम शासक इसके शासन काल मे अनंतवर्मा चोड्गंग ने उत्कल पर विजय प्राप्त किया था कोसल पर कलचुरियों ने आक्रमण कर विजय प्राप्त किया। 

प्रिय पाठकगण इतिहास भाग 4 के अंतर्गत हमने पाण्डुवंश का पूर्णतः अध्ययन किया यह बहुत ही महत्वपूर्ण टॉपिक था CGPSC एवं CGVYAPM की परीक्षाओं के लिए आशा करता हूँ कि आज का पोस्ट आप सभी को अच्छा लगा होगा। अगले पोस्ट में हम बाण वंश, फणी नाग वंश ,छिन्दक नाग वंश का अध्ययन करेंगे। PDF download  लिंक में जाकर डाऊनलोड कर सकते है ।

P R CLASSES BALODA 

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