छत्तीसगढ़—14 मई 2021 को छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा महतारी दुलार योजना कि घोषणा की गई ।इस योजना के तहत covid-19 संक्रमण में मृत हुए पालकों के बच्चों के पढ़ाई की व्यवस्था सरकार करेगी तथा छात्रवृत्ति भी प्रदान करेगी । covid-19 संक्रमण से यदि परिवार का मुखिया जो कि रोजी -रोटी कमाता है ,कि कोरोना से मृत्यु हो जाती है तो ऎसे पालकों के बच्चे भी महतारी दुलार योजना के लिए पात्र होंगे।
सर्वविदित है कि वर्ष 2021 में वर्तमान में पूरा देश कोरोना के द्वितीय लहर से जूझ रहा है ,जिसके कारण पूरे देश के लगभग सभी जिलों में lockdown की स्थिति निर्मित हो गई है,कोरोना के दूसरे लहर में देश में मृत्यु दर भी बढ़ने लगा है ,इस परिस्थिति से छत्तीसगढ़ राज्य भी अछूता नहीं रहा,कोरोना के कारण गरीब परिवारों के मुख्य व्यक्ति जिसकी कमाई से पूरे परिवार का रोजी रोटी चलता था,ऐसे व्यक्तियों को कोरोना की मार ने स्वर्गलोक में पहुँचा दिया। ऐसे गरीब तबके के बच्चों के बेहतर भविष्य के लिए छत्तीसगढ़ राज्य के मुख्यमंत्री माननीय भूपेश बघेल द्वारा 14 मई 2021 को महतारी दुलार योजना की घोषणा की,सम्भवतः यह योजना अनाथ हुए बच्चों के स्वर्णिम भविष्य के लिए मार्ग प्रशस्त करेगा।
उद्देश्य– इस योजना का मुख्य उद्देश्य अनाथ हुए बच्चों के लिए तथा ऐसा परिवार जिसका मुखिया covid19 संक्रमण से मृत हुआ हो ,के बच्चों के लिये निःशुल्क पढ़ाई की व्यवस्था करना एवं प्रति माह छात्रवृत्ति प्रदान करना है।
योजना के मुख्य बिंदु—
छत्तीसगढ़ सरकार की महतारी दुलार योजना अनाथ बच्चों के शिक्षा एवं सुरक्षा की गारंटी देता है। वर्तमान में इस तरह की योजना लागू करने वाला छत्तीसगढ़ एक मात्र राज्य है।
बच्चों के निःशुल्क पढ़ाई की व्यवस्था सरकार करेगी।
कक्षा पहली से आठवीं तक के बच्चों के लिए प्रतिमाह 500₹ की छात्रवृत्ति का प्रावधान।
कक्षा नवमीं से बारहवीं तक छात्रों के लिए प्रति माह 1000₹ का प्रावधान
शासकीय आत्मानंद अंग्रेजी माध्यम विद्यालय में ऐसे बच्चों को भर्ती के लिए प्राथमिकता दी जाएगी।
स्कूलों में ऐसे बच्चे भर्ती होते है तो उनसे किसी भी प्रकार का शुल्क नहीं लिया जाएगा।
यह योजना शासकीय एवं निजी दोनों स्कूलों में लागू होगा।
CGPSC एवं VAYPAM परीक्षा के लिए शार्ट नोट्स
योजना –महतारी दुलार योजना
उद्देश्य–अनाथ बच्चों को निःशुल्क शिक्षा एवं छात्रवृत्ति प्रदान करना।
घोषणा तिथि—14मई 2021
घोषणकर्ता–मुख्यमंत्री भूपेश बघेल
क्रियान्वयन एजेंसी— राज्य सरकार
लाभार्थी–कोरोना महामारी से मृत पालकों के बच्चे।
यह ब्लॉग आगामी छ. ग.व्यापम एवं छत्तीसगढ़ लोक सेवा आयोग की मुख्य परीक्षा को देखते हुए बनाया गया है। निबंध लेखन ,छत्तीसगढ़ की योजना वाले प्रश्न पत्रों में इस योजना से संबंधित प्रश्न पूछने की प्रबल संभावना है।
नीचे पीडीएफ डाऊनलोड लिंक में क्लिक करके सेव कर लें ।
छत्तीसगढ़ प्राचीन इतिहास भाग 3 के अंतर्गत उपरोक्त वर्णित वंशो के शासन का क्रमबद्ध अध्ययन करेंगे। क्योंकि ये सभी वंश भारतीय इतिहास में भी महत्वपूर्ण स्थान रखते है तथा इन सभी वंशों का छत्तीसगढ़ में भी प्रत्यक्ष प्रभाव रहा है जो की छत्तीसगढ़ के प्रतियोगी परीक्षा के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण है।
★महाजनपद काल★
शासन काल –छठवीं शताब्दी ई.पू.
भारतीय इतिहास में महाजनपद काल का विशेष महत्व है ,क्योंकि यहीं से भारतीय इतिहास का क्रमबद्ध वर्णन मिलता है।
महाजनपद काल में सम्पूर्ण भारत वर्ष 16 महाजनपदों में विभाजित था।
अंगुत्तर निकाय ,भगवती सुत्त पाली ग्रंथों में 16 महाजनपदों के उल्लेख मिलता है ।
पाणिनि ने 9 जनपदों का उल्लेख किया है।
महाजनपद काल बुद्ध के समकालीन राज्य थे।
छत्तीसगढ़ 16 महाजनपदों के चेदि महाजनपद के अंतर्गत आता है।
चेदि महाजनपद की राजधानी शुक्तिमति तथा शासन क्षेत्र बुंदेलखंड का पठार प्रमुख था।
महाजनपद काल में छत्तीसगढ़ को चेदिस गढ़ कहा जाता था ,इतिहासकार हीरालाल शुक्ल के अनुसार इसी के अपभ्रंश से छत्तीसगढ़ का नामकरण हुआ है।
★मौर्यकाल 322-185 ई.पू.★
भारतीय इतिहास में मौर्य साम्राज्य की स्थापना महत्वपूर्ण घटनाक्रम में से एक है। इस समय भारत मगध पर शासन करना किसी भी शासक के लिए महत्वपूर्ण था। मगध में सर्वप्रथम हर्यक वंश के बिम्बिसार ने शासन किया इस वंश के बाद शिशुनाग वंश तथा तीसरे वंश के रूप में नंद वंश ने मगध पर शासन किया। नंद वंश के अंतिम शासक घनानंद को पराजित कर चंद्रगुप्त मौर्य ने मगध पर मौर्य साम्राज्य की स्थापना की ।
इसका विस्तार से वर्णन भारतीय प्राचीन इतिहास में करेंगे ।
छत्तीसगढ़ में मौर्य साम्राज्य के प्रभाव एवं पुरातात्विक साक्ष्य——
चंद्रगुप्त मौर्य का साम्राज्य बंगाल की खाड़ी से अरब सागर के मध्यसागर के देशों तक फैला था किंतु इसके स्पष्ट प्रमाण महाकोशल में नहीं मिलते है।
दक्षिण कोसल क्षेत्र सम्भवतः नंद-मौर्य साम्राज्य का अंग था इसकी पुष्टि चीनी यात्री व्हेनसांग के यात्रा वृतांत से होती है।
व्हेनसांग के अनुसार सम्राट अशोक ने दक्षिण कोसल में बौद्ध स्तूप का निर्माण कराया था।
छत्तीसगढ़ में मौर्य कालीन अभिलेख —
सरगुजा जिले के रामगढ़ पहाड़ी में जोगीमारा गुफा एवं सीताबेंगरा गुफा में पाली भाषा एवं ब्राह्मी लिपि में लेख लिखे गए है।
जोगीमारा गुफा में नर्तकी सुतनुका देवदासी एवं उसके प्रेमी देवदत्त का उल्लेख मिलता है।
डॉक्टर संतलाल कटारे ने इसका अध्ययन किया था।
सीताबेंगरा गुफा को एशिया की प्रथम नाटशाला मानी जाती है। यह पूर्णतः भारतीय मुक्तकाशी(open air theater) है।
सरगुजा के इन गुफाओं की खोज कर्नल आउसले(1848 ई.) तथा डॉ. ब्लास (1904 ई.) में की थी ।
कालिदास द्वारा मेघदूत नाटक की रचना इसी नाट्यशाला में की गई थी। कालिदास द्वारा उल्लेखित रामगिरि पहाड़ को रामगढ़ माना माना जाता है।
डॉक्टर रामेन्द्र नाथ मिश्र ने 1969-70 ई.आरंग तथा गुजरा गांव में ‘आहत सिक्कों’ की खोज की थी जो कि गोनगल श्रेणी के सिक्के थे।
मौर्यकालीन आहत मुद्रा प्राप्ति स्थल छत्तीसगढ़ में—
अकलतरा,ठठारी (जांजगीर-चांपा)
बरगांव,देवगांव (रायगढ़)
उड़ेला( रायपुर)
चांदी के सिक्के—अकलतरा-(259 चांदी के आहत सिक्के)
ठठारी –(253 चांदी के आहत सिक्के )
तारापुर(रायगढ़) से 15 चांदी के सिक्के मिले है।
मौर्य काल की एक प्रमुख घटना सरगुजा जिले से जुड़ी हुई है। सरगुजा जिले के मैनपाट के ग्राम सरभंजा में अगस्त्य मुनि का आश्रम माना गया है जिन्होंने हिन्दू धर्म का प्रचार दक्षिण भारत में की तथा नई तमिल भाषा का प्रचलन भी किया ।
★सातवाहन वंश★230 ई.पू.से 220 ई.तक
सातवाहन वंश की राजधानी —प्रतिष्ठान(महाराष्ट्र)
सातवाहन कालीन सिक्के छत्तीसगढ़ बालपुर के निकट महानदी में मिले है।(हाथी चिन्ह वाले चार वर्गाकार सिक्के।
मल्हार(बिलासपुर) में अपीलक की मुद्रा से स्पष्ट होता है कि छत्तीसगढ़ में सातवाहन साम्रज्य था ।
गुंजी (जांजगीर-चांपा) शिलालेख में राजवरदत्त श्री का लेख है जो कि ईसा प्रथम शताब्दी का है।
किरारी नामक ग्राम में सातवाहन कालीन काष्ठ स्तंभ प्राप्त हुआ है।
वर्ष 1921 में खोजा गया था वर्तमान में गुरु घांसीदास संग्रहालय रायपुर में सुरक्षित है।
इस काष्ठ स्तम्भ में सातवाहन कालीन कर्मचारियों तथा उनके पदनामों का उल्लेख किया गया है।
बिलासपुर में मल्हार के समीप बूढ़ीखार ग्राम के वैष्णव देवता की मूर्ति पर ईसा से पूर्व पहली शताब्दी के ब्राम्ही अक्षरों से अंकित लेख ज्ञात हुआ है।
यह लेख प्रभावती और भारद्वाजी नामक स्त्रियों के द्वारा मूर्ति निर्माण सूचित करती है।
दक्षिण कोसल की राजधानी के निकट एक पर्वत पर सातवाहन राजा ने एक सुरंग खुदवा कर प्रसिद्ध बौद्ध भिक्षु नागार्जुन के लिए एक पांच मंजिला भव्य संघाराम बनवाया था।
बिलासपुर एवं चकरबेडा में रोमन सिक्के की प्राप्ति हुई है।
आरंग में पश्चिमी क्षत्रप का 1 क्षत्रप
सिक्का मिला है।
सातवाहन कालीन सिक्के
अमरावती शैली की सातवाहन कालीन मूर्ति
,,,,,,,,कुषाण वंश ,,,(30 ई.से 225 ई.तक),,,,,
भारतीय इतिहास के संदर्भ में—
संस्थापक—कुजूल कडफाइसिस(30 ई.में)
प्रतापी शासक—कनिष्क
छत्तीसगढ़ में कुषाण वंश के प्रमाण—
कुषाण वंश के शासन का प्रत्यक्ष प्रमाण छत्तीसगढ़ में नहीं मिलता किन्तु तांबे के सिक्के बिलासपुर में मिले है।
इस वंश के सोने के सिक्के तेलिकोटा(रायगढ़) में मिले है।
मेघवंश
संस्थापक–महाराज मेघ(मघ)
पुराणों के विवरणों से ज्ञात होता है कि गुप्तों के उदय के पूर्व कोसल राज्य में मेघवंश के शासक राज्य करते थे।
छत्तीसगढ़ में मेघवंशीय शासक शिवमेघ एवं यमेघ की जानकारी मिलती है।
★वाकाटक वंश★
राजधानी —नंदिवर्धन(नागपुर)
संस्थापक –विंध्यशक्ति
शासनकाल–तीसरी सदी के मध्य से छठी सदी तक
शासन क्षेत्र—बरार,आन्ध्र प्रदेश,मध्यप्रदेश का बघेल खंड पठार,छत्तीसगढ़ का दक्षिण क्षेत्र ।
वायुपुराण एवं अजंता लेख के अनुसार विंध्यशक्ति वाकाटक वंश का संस्थापक राजा थे।
प्रथम राजा विंध्यशक्ति के लिए अजंता लेख में “वाकाटक वंशकेतु:” वाक्य का प्रयोग किया गया है।
इस वंश का नाम वाकाटक क्यों रखा गया इसका स्पष्ट प्रमाण नहीं है ।
पृथ्वीसेन द्वितीय को “वाकाटक वंश के खोये हुए भाग्य का निर्माता कहा जाता है।
छत्तीसगढ़ में शासन करने वाले प्रमुख वाकाटक नरेश निम्न है—-
प्रवरसेन प्रथम– विंध्यशक्ति के पुत्र प्रवसेन प्रतापी राजा हुआ जिसने नागपुर से दक्षिण कोसल तक अपना शासन स्थापित किया। प्रमाण स्वरूप दुर्ग से प्राप्त अपूर्ण ताम्रपत्र में उल्लेखित।K
महेंद्र सेन– हरिषेण कृत प्रयाग प्रशस्ति अभिलेख के अनुसार दक्षिण भारत अभियान के दौरान समुद्र गुप्त ने दक्षिण कोसल नरेश महेंद्र सेन को पराजित किया था।
रुद्रसेन -द्वितीय— चंद्रगुप्त द्वितीय की पुत्री प्रभावती से विवाह किया । रुद्रसेन द्वितीय की अकाल मृत्यु हो जाने के कारण चंद्रगुप्त द्वितीय ने अपनी पुत्री के शासन में पूर्ण सहयोग किया था।
प्रवरसेन द्वितीय—वाकाटक वंश के प्रतापी शासक।
प्रवरपुर नगर की स्थापना की इसे अपना राजधानी बनाया।
‘सेतुबंध’ ग्रंथ की रचना की थी।इसे रावणवहो ग्रंथ भी कहा जाता है। प्रवरसेन वैष्णव धर्म का अनुयायी था।
इसके दरबार में महाकवि कालिदास रहते थे।
कालिदास ने मेघदूत काव्य की रचना सरगुजा के रामगढ़ की पहाड़ी में की थी।
पंडित मुकुटधर पांडे ने मेघदूत का छत्तीसगढ़ी में अनुवाद किया है ।
5.नरेंद्रसेन— नलशासक भवदत्त वर्मन ने नरेंद्रसेन को पराजित किया(ऋद्धिपुर ताम्रपत्र में उल्लेख)
6.पृथ्वीसेन द्वितीय— केसरीबेड़ा अभिलेख के अनुसार राजा पृथ्वीसेन ने नलशासक अर्थपति भट्टारक को पराजित किया। इस युद्ध में अर्थपति भट्टारक की मृत्यु हो गई। इसने अपनी राजधानी पदमपुर को बनाया था। वाकाटक वंश के मुख्य वंश का अंतिम शासक था।
7.हरिषेण– कालांतर में वाकाटकों के वत्सगुल्म शाखा के राजा हरिषेण ने दक्षिण कोसल में अधिकार कर लिया ।
वत्सगुल्म शाखा का संस्थापक सर्वसेन प्रवरसेन का पुत्र था।
विशेष तथ्य—★वाकाटक वंश के शासकों का युद्ध प्रायः बस्तर/कोरापुट के नलशासकों के साथ होता रहता था ।
★ गुप्तों के साथ वाकाटक वंश के शासकों का वैवाहिक संबंध थे इससे ज्ञात होता है कि वाकाटक गुप्तों की अधीनता स्वीकार करते थे क्योंकि बहुत से अभिलेखों में वाकाटक स्वयं को राजा तथा गुप्तों को महाराजधिराज संबोधित करते थे।
मोहला(दुर्ग) –प्रवरसेन का ताम्रपत्र प्राप्त हुआ है।
★गुप्तवंश★(319 ई.से 500ई. तक)
गुप्त काल को भारतीय इतिहास का स्वर्ण काल कहा जाता है।
संस्थापक– श्रीगुप्त
राजधानी–पाटलिपुत्र
गुप्तकाल में छत्तीसगढ़ का नाम दक्षिण कोसल या दक्षिणा पथ था।
गुप्तकाल में बस्तर को दंडकारण्य तथा सिहावा जंगल क्षेत्र को महाकांतार कहा जाता था।
समुद्रगुप्त—-गुप्त वंश के प्रतापी शासक समुद्रगुप्त के शासनकाल के अभिलेख हरिषेण कृत प्रयाग प्रशस्ति में सर्वप्रथम दक्षिण कोसल राज्य का उल्लेख मिलता है।
समुद्रगुप्त द्वारा दक्षिण कोसल के दो प्रमुख राजा वाकाटक नरेश महेंद्र सेन तथा महाकांतार के राजा व्याघ्रराज को पराजित किया था।
महासमुंद जिले के कोपरा गांव में समुद्रगुप्त के पत्नी रूपदेवी के साक्ष्य मिले है।
महासमुंद का नामकरण भी समुद्रगुप्त के साथ जोड़ा जाता है। कहा जाता है कि दक्षिण भारत विजय अभियान के दौरान समुद्रगुप्त की सेना कुछ समय के लिए यहाँ रुकी थी।
समुद्रगुप्त ने दक्षिण कोसल पर प्रत्यक्ष शासन नहीं किया बल्कि यहां के स्थानीय शासकों को मांडलिक के रूप में शासन करने दिया।
समुद्र गुप्त का सिक्का
रामगुप्त— रामगुप्त का सिक्का बानबरद(दुर्ग) से प्राप्त हुआ है।
चंद्रगुप्त द्वितीय—चंद्रगुप्त द्वितीय की पुत्री प्रभावती का विवाह वाकाटक नरेश रुद्रसेन द्वितीय से हुआ था।
कुमारगुप्त—- कुमारगुप्त का रत्नजड़ित मयूर सिक्का आरंग से प्राप्त हुआ है।
भानुगुप्त– भानुगुप्त के एरण अभिलेख में शरभपुरीय शासक शरभराज का उल्लेख मिलता है।
विक्रमादित्य का धनुर्धारी सिक्का खरसिया से प्राप्त हुआ है।
छत्तीसगढ़ में प्रमुख गुप्तकालीन स्थापत्य—
केंवटिन मंदिर पुजारीपाली( बरमकेला, रायगढ़)
तालागांव का मंदिर (बिलासपुर)
गुप्तकाल की स्थापत्य कला को नागर शैली कहा जाता है।
अगले पोस्ट में छत्तीसगढ़ के स्थानीय राजवंश का अध्यापन करेंगे जो कि छत्तीसगढ़ psc ,vyapm की प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए बहुत ही महत्त्वपूर्ण है।
छत्तीसगढ़ प्राचीन इतिहास भाग -1 के अंतर्गत कुछ महत्वपूर्ण बिंदुओं पर हमने चर्चा की तथा छत्तीसगढ़ राज्य में प्रागैतिहासिक काल के स्थलों का तथा वहां प्राप्त साक्ष्यों का वर्णन किया । अतः छत्तीसगढ़ प्राचीन इतिहास भाग 2 के अंतर्गत हम आद्य ऐतिहासिक काल एवं ऐतिहासिक काल का अध्ययन करेंगे जो कि CGPSC एवं CGVYAPM प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण है। कई बार परीक्षा में यहाँ से प्रश्न पूछे भी गये है।
2.आद्य ऐतिहासिक काल (2300-1700ई.पू.)
परिभाषा–वह काल जिसके अंतर्गत पुरातात्विक साक्ष्यों के साथ साथ लेखन कला का भी विकास हुआ था किंतु उसे आज तक पढ़ा न जा सका,,,आद्य ऐतिहासिक काल कहलाता है। इसी काल में कांसे के प्रमाण मिले है इसलिए इसे “कांस्य युग” भी कहा गया है । इस काल मे मुख्यतः सिंधु घाटी सभ्यता हड़प्पा संस्कृति भारत मे विकसित हुई थी ,,। विश्व के संदर्भ में देंखे तो चीनी सभ्यता, सुमेरियन सभ्यता(मेसोपोटामिया सभ्यता) मिश्र की नील नदी घाटी सभ्यता इस काल के अंतर्गत आते हैं।
छत्तीसगढ़ में आद्य ऐतिहासिक काल के प्रमाण अभी तक प्राप्त नहीं हुए हैं।
3.ऐतिहासिक काल–1500-600ई.पू.
ऐतिहासिक काल को मुख्यतः 2 भागों में विभाजित किया है(१) ऋग्वैदिक काल(1500-1000ई.पू.) (२) उत्तर वैदिक काल(1000-600 ई.पू.) इसलिए ऐतिहासिक काल को वैदिक सभ्यता भी कहा है ।
1.ऋग्वैदिक काल-भारत में इंडो-आर्यों का आगमन ऋग्वैदिक काल से माना जाता है । इसी काल में प्रथम वेद ऋग्वेद की रचना हुई थी इसलिए इस काल को ऋग्वैदिक काल कहा गया है। ऋग्वेद भारोपीय भाषाओं का प्राचीनतम ग्रन्थ माना जाता है। ऋग्वैदिक काल में आर्यों का भारत में मुख्य निवास स्थान पंजाब एवं उत्तर प्रदेश चिन्हित किया गया है। इस काल को प्रमुख नदी सिंधु नदी थी तथा एक ओर नदी सरस्वती का भी वर्णन है जिसे नदीतमा या सर्वश्रेष्ठ नदी कहा गया है।ऋग्वैदिक काल मे प्रमुख देवता इंद्र जिन्हें पुरंदर भी कहा जाता था।इंद्र देवता को समर्पित 250 श्लोकों की रचना ऋग्वेद में की गई है।इंद्रा देव को वृष्टि देव की संज्ञा दी गई है। उसके बाद अग्नि देव का स्थान आता है जिनके लिए ऋग्वेद में 200 श्लोकों की रचना की गई है।तीसरे स्थान में वरुण देव का स्थान आता है जिन्हें जल का देवता माना जाता था।
अतः ऋग्वेद में छत्तीसगढ़ का किसी भी प्रकार का वर्णन नहीं मिलता है।
2.उत्तर वैदिक काल — यह काल वैदिक ग्रन्थों पर आधारित है,जिन्हें ऋग्वैद काल के बाद संग्रहित किया गया था।इस काल मे आर्यों का विस्तार पंजाब से लेकर गंगा-यमुना दोआब क्षेत्र के साथ पूरे पश्चिमी उत्तर प्रदेश तक अपना विस्तार कर लिया था। उत्तर वैदिक काल के अंत तक आर्य उत्तर प्रदेश के कोसल से बिहार के विदेह तक फैल गए थे। इसी कोसल प्रदेश के उत्तरी क्षेत्र को उत्तर कोसल तथा दक्षिणी क्षेत्र को दक्षिण कोसल (वर्तमान छत्तीसगढ़) को कहा गया । उत्तर वैदिक काल में नर्मदा नदी का नाम रेवा नदी के नाम से उल्लेक्षित है इसलिए कहा जा सकता है कि उत्तर वैदिक काल मे आर्यों का विस्तार छत्तीसगढ़ में हो चुका था।
3.महाभारत काल—- उत्तर वैदिक काल में ही महाभारत महाकाव्य की रचना हुई थी। इस महाकाव्य के अनुसार 950ई.पू. पांडवों एवं कौरवों के मध्य युध्य हुआ था। भरत और पुरु,दो प्रमुख कबीलों के मिलने से कुरु समुदाय का गठन हुआ। दिल्ली के उत्तरी हिस्से में निवास करने लगे जिसे कुरुक्षेत्र कहा जाने लगा। बाद में ये पांचाल नामक लोगों के साथ रहने लगे थे। पांचालों की राजधानी हस्तिनापुर थी जो कि मेरठ जिले में पड़ता है। महाभारत युद्ध के पश्चात कुरु कबीले ही समाप्त हो गए।
छत्तीसगढ़ का महाभारत काल से सम्बन्ध —
महाभारत काल में छत्तीसगढ़ को महाकवि वेदव्यास के अनुसार प्राक्कोसल राज्य के नाम से जाना जाता था। इसी काल मे बस्तर(दंडकारण्य) को कान्तार नाम से उल्लेक्षित किया गया है। कर्ण द्वारा किये गए दिग्विजय यात्रा में भी कोसल जनपद का उल्लेख है।महाभारत के भीष्म पर्व में महानदी का नाम चित्रोत्पला उल्लेक्षित है। महाभारत कालीन ऋषभतीर्थ की पहचान गुंजी (दमउदरहा)(जांजगीर-चाम्पा) से की गई है।ऋषभतीर्थ का वर्णन महाभारत के वनपर्व में है।(पंडित लोचन प्रसाद के अनुसार)
महाभारत काल में अर्जुन के पुत्र बब्रुवाहन की राजधानी चित्रांगदपुर वर्तमान सिरपुर(महासमुंद) को तथा महाराजा मोरध्वज एवं ताम्रध्वज की राजधानी आरंग को माना जाता है।किन्तु प्राचीन जनश्रुति के अनुसार राजा मोरध्वज का संबंध आरंग ओर रतनपुर दोनों के साथ जोड़ा जाता है तथा मोरध्वज द्वारा राजधानी रतनपुर से आरंग स्थानांतरित किया गया ।
महासमुंद जिले के खल्लारी का संबंध भी महाभारत से जोड़ा जाता है जनश्रुति के अनुसार लाखागृह वर्तमान खल्लारी में था जहां पांडवों को दुर्योधन द्वारा लाख के घर मे आग से जला कर मारने के लिए बनाया गया था।माना जाता है कि खल्लवाटिका से ही खल्लारी नामकरण हुआ है। इसी के निकट ही भीमखोज नामक ग्राम है जिसका संबंध महाभारत काल से किया जाता है,जनश्रुति के अनुसार भीम के पांव के चिन्ह आज भी वहाँ के पत्थरों में अंकित है ।
छत्तीसगढ़ में महाभारत कालीन प्रमुख स्थल निम्नलिखित है—-
गुंजी –जांजगीर चांपा
आरंग–भांडेर
खल्लारी–खल्ल वाटिका
सिरपुर—चित्रांगदपुर
रतनपुर—मणिपुर
3.छत्तीसगढ़ का रामायण से संबंध——
वैदिक सभ्यता में कोसल राज्य 2 भागों में बंटा हुआ था ,उत्तर कोसल और दक्षिण कोसल में उत्तर कोसल राज्य के अंतर्गत वर्तमान उत्तरप्रदेश ,बिहार राज्य आते थे तथा दक्षिण कोसल के अंतर्गत छत्तीसगढ़ का हिस्सा आता था। इसी समय आर्यों का आगमन दक्षिण कोसल में हुआ।
रामायण काल में छत्तीसगढ़ का नाम दक्षिण कोसल तथा राजधानी कुशस्थली थी।दक्षिण कोसल के राजा भानुमंत की पुत्री कौशल्या का विवाह उत्तर कोसल के राजा दशरथ के साथ हुआ किन्तु राजा भानुमंत का कोई पुत्र न होने के कारण दक्षिण कोसल का राज्य भी राजा दशरथ को प्राप्त हुआ। इसलिए दशरथ पुत्र श्री राम का नौनिहाल छत्तीसगढ़ को माना जाता है। पूरे भारत में माता कौशल्या का एकमात्र मंदिर रायपुर के चंदखुरी में बन रहा है । रामायण काल मे दक्षिण कोसल की भाषा कोसली थी जो छत्तीसगढ़ की सबसे प्राचीन भाषा है।रामायण काल में बस्तर को दंडकारण्य कहा जाता है जहां श्री राम अपने वनवास काल मे कुछ समय यहां व्यतीत किये थे।राम भगवान के 2 पुत्र लव एवं कुश को राज्य विभाजन के समय लव को उत्तर कोसल(राजधानी-श्रावस्ती) का राजा घोषित किया गया तथा कुश को दक्षिण कोसल का राज्य प्राप्त हुआ इस नाम से दक्षिण कोसल की राजधानी कुशस्थली का नामकरण हुआ।
रामायण कालीन प्रमुख स्थल एवं घटनाक्रम निम्न है—
1.सूरजपुर—सितालेखनीपहाड़
2.कोरिया–सीतामढ़ी गुफा(हरचौका) या रसोईघर
3.सरगुजा—-रामगढ़ की पहाड़ी( सीताबेंगरा-लक्ष्मण बेंगरा)
4.खरौद—खरदूषण का वध
5.शिवरीनारायण—शबरी के जूठे बेर श्री राम यही खाये थे।
6.चंदखुरी—कौशल्या माता का मंदिर
7.बलौदाबाजार—वाल्मीकि आश्रम ,लव कुश की जन्मस्थली
8.पंचवटी—(कांकेर)—सीता हरण
9.दंडकारण्य(दंतेवाड़ा)— वनवास काल में यहाँ कुछ समय रुके थे भगवान राम।
छत्तीसगढ़ राज्य सरकार द्वारा रामायण काल के महत्व को देखते हुए रामवनगमन पथ के रूप 51 स्थलों का चयन किया गया है । जिससे पर्यटन को बढ़ावा दिया जा सके जिसकी शुरुआत 22 नवम्बर 2019 को चंदखुरी में माता कौशल्या मंदिर निर्माण से की गई है। वर्तमान में 9 स्थलों को रामवनगमन पथ के रूप में विकसित करने का निर्णय राज्य सरकार द्वारा चिन्हित किया गया है। रामवनगमन पथ के लिए मन्नू लाल यदु की दंडकारण्य रामायण तथा डॉ.हेमू यदु की छत्तीसगढ़ रामायण के राम वन गमन पथ को आधार माना गया है।
4.बौद्ध धर्म का संबंध छत्तीसगढ़ में —
चीनी यात्री व्हेनसांग की यात्रा वृतांत सी-यू-की में दक्षिण कोसल राज्य में बौद्ध धर्म के प्रभाव का वर्णन किया गया है। व्हेनसांग ,नालन्दा विश्वविद्यालय में अध्यापन के लिए आये थे तथा उन्होंने बौद्ध धर्म के सामग्रियों का संकलन एवं बौद्ध धर्म के प्रचार हेतु भारत भ्रमण के लिए जब निकले ,तब छत्तीसगढ़ राज्य तत्कालीन दक्षिण कोसल(श्रीपुर) में कुछ दिनों तक निवासरत थे । अपने यात्रावृत्तांत में ह्वेनसांग में दक्षिण कोसल की राजधानी श्रीपुर को कहा तथा तत्कालीन पांडुवंशी शासक महाशिवगुप्त बालार्जुन का वर्णन किया है।
सिरपुर(जिला-महासमुंद) से प्राप्त बौद्ध धर्म से संबंधित पुरातात्विक साक्ष्य प्रमाण है कि छत्तीसगढ़ में बौद्ध धर्म की समृद्ध परंपरा थी ।
व्हेनसांग की यात्रा वृतांत में छत्तीसगढ़ का नाम कि-या-स-लो नाम से वर्णित है ,सम्भवतः कोसल का अपभ्रंश होगा।
व्हेनसांग ने 639 ई.पू. में सिरपुर की यात्रा की तथा कुछ समय तक यहाँ रुका भी था।
व्हेनसांग ने विश्वविख्यात शून्यवाद के जनक ,महान दार्शनिक, रसायन शास्त्री, मध्यिका सूत्र के जनक नागार्जुन को दक्षिण कोसल का माना है।
आज भी सिरपुर की पहाड़ी में नागार्जुन गुफा स्थित है। जिसे स्थानीय ग्रामीण छेरी गोदरी गुफा कहते है।
बौद्ध धर्म के प्रमुख ग्रंथ अवदान शतक में भी छत्तीसगढ़ का नाम दक्षिण कोसल नाम से उल्लेखित है।गौतम बुद्ध भी कुछ समय के लिए श्रीपुर (सिरपुर)में रुके थे।
मौर्य सम्राट अशोक के शासन काल मे छत्तीसगढ़ में बौद्ध धर्म का व्यापक प्रचार प्रसार हुआ जिसके प्रमाण सरगुजा के रामगढ़ पहाड़ी के सीताबेंगरा एवँ जोगीमारा गुफा में मौर्य कलीन उत्कीर्ण लेख प्रमाण स्वरूप आज भी स्थित है।
व्हेनसांग के अनुसार सिरपुर में 100 संघाराम (बौद्ध स्तूप) एवं 1000 महायानी बौद्ध भिक्षुओं को निवास करते देखा है। सम्भवतः ये स्तूप सम्राट अशोक द्वारा बनाये गए होंगे।
अतः कहा जा सकता है कि सम्राट अशोक के समय से ही दक्षिण कोसल में बौद्ध धर्म का व्यापक प्रचार प्रसार हो चुका था।
छठवीं शताब्दी में बौद्ध भिक्षु आनंद प्रभु ने स्वास्तिक विहार का निर्माण सिरपुर में किया था जो कि आज भी आनंद प्रभु कुटी विहार के नाम से अवस्थित है।
सिरपुर में स्थित बौद्ध प्रतिमा
5.छत्तीसगढ़ का जैन धर्म से संबंध —-
बौद्ध धर्म के समान जैन धर्म का भी छत्तीसगढ़ में व्यापक प्रचार प्रसार मिलता है। आज भी छत्तीसगढ़ में विद्यमान कई जैन मंदिर एवं पुरातत्विक उत्खनन से प्राप्त सामग्री जैन धर्म की गौरवशाली संस्कृति को दर्शाती है।
★जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव के प्रमाण गुंजी (दमाऊदरहा)(जांजगीर-चांपा) से प्राप्त होते है।
★ऋषभदेव की मूर्ति जिला बिलासपुर के मल्हार के समीप बूढ़ीखार से भी प्राप्त हुई है।
★ राजिम में पुरातत्व उत्खनन के समय 1600 वर्ष पुरानी ऋषभदेव की मूर्ति प्राप्त हुई है।
★ नगपुरा(जिला-दुर्ग) में 23वें तीर्थ कर पार्श्वनाथ की मंदिर आज भी विद्यमान है।
★ बस्तर के भाटागुड़ा में जैन धर्म के 16 वें तीर्थंकर शांति नाथ की 3फिट पाषाण मूर्ति प्राप्त हुई है।
★ जिला-गौरेला-पेंड्रा-मरवाही का प्राचीन नगर धनपुर में जैन धर्म से संबंधित प्राचीन मूर्तियां आज भी विद्यमान है।
★ मंदिरों की नगरी आरंग में स्थित भांडलदेव मंदिर आज भी अवस्थित है ,जो कि जैन धर्म से संबंधित है।
जैन धर्म की दोनों शाखाओं दिगम्बर एवं श्वेतांबर शाखायों का प्रभाव रहा है।
छत्तीसगढ़ प्राचीन इतिहास के अध्ययन के पूर्व प्रमुख तथ्यों का अवलोकन करते है जो ,कि cgpsc परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण है।
★महत्वपूर्ण तथ्य★
* छत्तीसगढ़ को लोचन प्रसाद पाण्डे जी ने मानव सभ्यता का जन्मस्थली कहा है।
*चुम्बरढाल पहाड़ियों के शैलाश्रयों में रेलवे इंजीनियर अमरनाथ दत्त ने सन 1910 में अनेक गुफाओं की खोज की थी।
*छत्तीसगढ़ की सबसे प्राचीन गुफा सिंघनपुर गुफा(रायगढ़) की खोज सन 1910 में एंडरसन ने की थी।
*इंडिया पेंटिंग्स सन 1918 में तथा इनसाइक्लोपीडिया ब्रिटेनिका के 13 वें अंक में रायगढ़ के सिंघनपुर के शैल चित्रों का प्रकाशन हुआ था!
*सिंघनपुर गुफा को चट्टानी आश्रम कहना अधिक उपयुक्त होगा क्योंकि इस गुफा में विश्व विख्यात शैलचित्र है।
* सबसे लंबी गुफा बोतल्दा (रायगढ़)
*प्रागैतिहासिक काल में सर्वाधिक शैलचित्र रायगढ़ जिले से प्राप्त हुए है।
*सिंघनपुर गुफा चित्र गहरे लाल रंग के है।*सिंघनपुर शैलचित्र 30000 वर्ष पुराने है। इन मूर्तियों की तुलना मैक्सिकन एवं स्पैनिश शैली से की जाती है।
सिंघनपुर गुफा चित्र
इतिहास को मुुख्यतः तीन कालखंंडोंं मेें विभक्त किया गया —
1-प्रागैतिहासिक काल2.आद्य ऐतिहासिक काल3.ऐतिहासिक काल
उपरोक्त तीनों कालों को चरणबद्ध रूप से विस्तृत अध्ययन करेंगे ।
1.प्रागैतिहासिक काल(500000 ई.पू.से 2500 ई. पू.तक)—
वह काल जिसकी जानकारी पुरातात्विक स्रोतों से प्राप्त होती है।इस समय का कोई लिखित प्रमाण प्राप्त न हुआ है । इस काल को “प्रस्तर युग” भी कहा जाता है।प्रागैतिहासिक काल का शाब्दिक अर्थ होता है –“इतिहास के पूर्व का युग”
प्रागैतिहासिक काल को पुनः 3 काल खण्डों में विभाजित किया गया है –1.पूरा पाषाण काल–a)निम्न पुरापाषाण काल (b)मध्य पुरापाषाण काल (c)उच्च पुरापाषाण काल
2.मध्य पाषाण काल
3.नवपाषाण काल
छत्तीसगढ़ में प्रागैतिहासिक काल के प्रमाण 1.पुरापाषाण काल—-सिंघनपुर की गुफा (रायगढ़) हस्तचालित कुदाल ,गुफा चित्र ,शैलचित्र
2.मध्य पाषाण काल—कबरा पहाड़(रायगढ़) यहां की चित्रकारी में लाल रंग की छिपकली, घड़ियाल ,कुल्हाड़ी ,साम्भर आदि के चित्र बने है ।इस काल के लंबे फलक वाले औजार ,अर्धचन्द्राकार लघु पाषाण औजार के साख्य प्राप्त हुए है।
3.उत्तर पाषाण काल—- इस काल के प्रमाण मुख्यतः धनपुर ,महानदी घाटी(रायगढ़)सिंघनपुर से प्राप्त हुए है।यहाँ के पहाड़ों एवं गुफा में मानव आकृतियों का चित्रण तथा औजारों की आकृतियां खुदी हुई प्राप्त हुई है।
4.नवपाषाण काल— इस काल के प्रमाण छत्तीसगढ़ में मुख्यतः अर्जुनी (दुर्ग) ,चितवाडोंगरी(राजनांदगांव), टेरम(रायगढ़)बोनटीला(राजनांदगांव) से प्राप्त हुए है।
5.पाषाण घेरे —इसका तात्पर्य है पाषाण काल मे मनुष्य की मृत्यु होने पर शव को दफना कर उसके चारों ओर बड़े बड़े पत्थरो को गाड़ दिया जाता था ताकि जानवरों से शव की रक्षा की जा सके।प्रागैतिहासिक काल से संबंधित पाषाण घेरे छत्तीसगढ़ के निम्न स्थानों से प्राप्त हुए है। करहीभदर,चिरचारी(बालोद)गढ़ धनोरा (कोंडागांव)
* स्थापना– 1 नवंबर 2000*राजधानी –रायपुर (नवा रायपुर ,अटल नगर)*मातृ राज्य–मध्यप्रदेश(मध्यप्रदेश राज्य पुनर्गठन अधिनियम 2000 के अंतर्गत)*छत्तीसगढ़ देश का 26 वॉ राज्य* छ. ग. राज्य का कुल क्षेत्रफल–1,35,191कि.मी.वर्ग *छत्तीसगढ़ का क्षेत्रफल देश के कुल क्षेत्रफल का–4.11%*छत्तीसगढ़ की कुल जनसंख्या(2011जनगणना)–25545198*देश की कुल जनसंख्या का 2.11%छत्तीसगढ़ में निवास करती है।*जनसंख्या घनत्व–189*छ. ग. में विधानसभा सीट–90*छ. ग.में राज्यसभा सीट–5*छ. ग.में लोकसभा सीट–11*छ. ग.का प्राचीन नाम– दक्षिण कोसल*छत्तीसगढ़ राज्य निर्माण 9वीं पंचवर्षीय योजना के दौरान हुई।(वर्ष1997-2000)*छ. ग.उच्चन्यायालय–बिलासपुर –देश का 19 वां *रेलवे जोन–दक्षिण-पूर्व-मध्य रेलवे का मुख्यालय –बिलासपुर *छत्तीसगढ़ का सबसे बड़ा संभाग(क्षेत्रफल की दृष्टि से)—बस्तर *छत्तीसगढ़ का सबसे छोटा संभाग–दुर्ग(क्षेत्रफल की दृष्टि से)*छत्तीसगढ़ का सबसे बड़ा जिला–राजनांदगांव*छत्तीसगढ़ का सबसे छोटा जिला–दुर्ग(क्षेत्रफल की दृष्टि से) *छत्तीसगढ़ में कुल जिले–27 *छत्तीसगढ़ में कुल विकासखंड–146*सबसे बड़ा तहसील– पोड़ी -उपरोड़ा(कोरबा)*सबसे बड़ा विकास खंड–बिल्हा(बिलासपुर)*क्षेत्रफल के आधार पर देश मे छत्तीसगढ़ का स्थान–9वां*जनसंख्या के आधार पर देश मे छत्तीसगढ़ का स्थान–16वां * जिला पंचायत–27*जनपद पंचायत–146*ग्राम पंचायत–11,664